Wednesday, October 8, 2008

class notes date 10/7/08 Tuesday

अधिकार ८ :: अनुयोगो मे परस्पर विरोध का निराकरण

jai jinendra

कौनसे उपदेश ग्रहण करना :->
जिस प्रकार शब्दों के अनेक अर्थ होते है उन्हे जहाँ जैसा सही हो वैसा जानना चहिये उसी प्रकार उपदेश के बारे में कहा है कि उपदेश भी अनेक प्रकार के होते है उन्हे हमे सुनना तो चहिये परंतु ग्रहण उन्हें ही करना चाहिये जो कि हमारे विकार को दुर करे और हमे हमारे प्रयोजन याने आत्मा के कल्याण के मर्ग पर चलने मे सहायक हो। हमारे राग द्वेषादि विकारी भावो का विरोध करने वाले उपदेश ग्रहण करने चाहिये और उन्हे पुष्ट करने वाले उपदेश नही ग्रहण करने चाहिये।
जैसे औषधी तो अनेक प्रकार की होती है परंतु हमे जैसा रोग हो उसे नष्ट या दुर करने वाली औषधी हि हम ग्रहण करते है उसी प्रकार उपदेश का भी जानना।
हमे पक्षवादि बनकर उपदेश सुनने नही चाहिए ।पक्षबुद्धि से भला नही होता इसलिए अपने लिए क्या कार्यकारी है उस उपदेश को ही अंगीकार करना चाहिए। जैसे किसी जीव को व्यवहार का ज्ञान अथवा बह्य क्रियाओ कि प्रधानता या अधिकता हो और वह व्यवहार का हि पोषक कराने वाले उपदेश सुने तो वह आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे नही बढ पायेगा या आत्मानुभव नही कर पायेगा वैसे हि किसी जीव को निश्चय का ज्ञान हो या अधिकता हो और वह निश्चय का हि उपदेश सुने तो वह वैराग्य कि ओर न बढकर अपने को जो अच्छा लगे वैसा करके विषय कषाय का हि पोषण करेगा, वह कोइ भी धार्मिक क्रियाए नही करेगा और इस तरह वह अपना बुरा हि करेगा ।
इसलिए हमारे लिये जो उपदेश हो उस ही को ग्रहण करना चाहिए एकान्त बुद्धि से उपदेश को ग्रहण नही करना चाहिए। निश्चय या व्यवहार में से किसी एक ही नय में अगर हमारा ज्ञान हो तो इससे सम्यक्त्वता का पूर्ण होना सम्भव नही है इससे हमारा बुरा ही होगा ।
यहाँ एक तात्वीक उदाहरण देते है कि आत्मानुशासन शास्त्र मे कहा है की "तु गुणवान होकर दोष क्यों लगाता है? दोषवान होना था तो दोषमय ही क्यों नही हुआ।" यहाँ यह उपदेश गुणवान जीव या व्रती के लिये कहा है जिससे कभी उस जीव से कोइ दोष होते हो तो वह दुर हो जाये या दुर करे, परंतु अगर यह उपदेश कोइ अज्ञानी या अव्रती ग्रहण कर ले तो वह उसका विपरीत अर्थ निकालकर उन गुणवान जीव को निचा दिखलाये या विचार करे कि ऐसा दोष लगाने से अच्छे तो हम है जो हमने कोइ व्रत हि ग्रहण नही किये है तो यह बुरा होगा ।सर्वदोषमय होकर कोइ व्रत ग्रहण न करे और गुणवान कि निन्दा करे तो वह भी दोष ही है।कभी किसी गुणवान जीव से कोइ गलती से कही किंचीत दोष हो जाए तो वह सर्वदोषमय जीव से तो अच्छा ही है। और गुणवान या व्रती से किंचीत दोष होने पर उसकी निन्दा की जाए फिर तो सर्व दोषोसे रहीत तो केवल सिद्ध भगवान ही है उनसे निचली अवस्था वाले जीवो मे गुणदोष तो होते ही है।

"दोषवान होना था तो दोषमय ही क्यो नही हुआ" इसका अर्थ केवल कहने के लिये है तर्क के लिये है ताकि उससे गुणवान जीव से जो किंचीत दोष हो रहा हो तो वह उसे दुर कर सके यहा कोइ यह समझ ले की शास्त्रजी मे तो लिखा है तो अगर हम दोषमय है तो क्या बुरा तो एसा विचार उस जीव के लिये बुरा हि करेगा।
उदाहरण: जैसे पिताजी ने बच्चे को पढाई के समय tv देखते देखकर कहा कि "तुम तो tv ही देख लो उसी से तुम पास हो जाओगे तुम्हारी किताबे और बस्ता जला देते है " तो वह बच्चा पिताजी के केहने का सही मतलब जानकर tv बन्दकर पढ्ने बेठ जाता है ना कि अपना बस्ता या किताबे जलाता है ।
जैसे शीत का रोग हुआ हो तो गरम औषधी लेते है और गर्मी से कोइ रोग हो रहा हो तो शीत औषधी लेते है विपरीत भी नही लेते उसी प्रकार उपदेश का भी सही अर्थ निकालकर हमारी कमी को जो पुरा कर रहा हो उसे ही ग्रहण करना चाहिए विपरीत ग्रहण नही करना चाहिए।
………

Trupti Jain

1 comment:

Vikas said...

Summarized well. If possible, please reference the page # also.