Thursday, October 16, 2008

15th Oct 2008 - दूसरा अधिकार [अब तक]

१) कर्म का बन्ध अनादि से है ।
२) उत्कृष्ट बंध 70 कोडा कोडी [मोहनीय] ।
३) भाव-कर्म और द्रव्य कर्म में निमित्त-नैमॆत्तिक संबंध है ।
४) घातीया-अघातिया कर्म, आत्मा के स्वभाव के घातने-न घातने से नाम पाते हैं ।
५) कर्मों की दस अवस्थाऎं -
१) बंध २) उदय ३) सत्ता ४) उदीरणा ५) अपकर्षण
६) उत्कर्षण ७) संक्रमण ८) उपशांत ९) निधत्ती १०) निकाचित
६) नित्य निगोद [निगोद, जहां से जीव अभी तक निकले ही नहीं हैं]
इतर निगोद [एक बार नित्य निगोद से निकलकर पुनः निगोद]
दोनों के दुखॊं में कोई भेद नहीं है ।
उतक्रष्ट काल - नित्य निगोद - अनादी अनंत
इतर निगोद - ढाई पुदगल परावर्तन
एकेंद्रीय - असंख्यात पुदगल परावर्तन

मति ज्ञान - इंद्रीय और मन के द्वारा होने वाला परोक्ष-ज्ञान ।

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