Thursday, October 23, 2008

Notes from 22nd October, 2008, pg 32-34

कर्मबंधनरूप रोगों के निमित्त से होनेवाली जिवकी अवस्था

यह अधिकार में ८ कर्मो के कारण से जिव की कैसी अवस्था होती है उसके बारे में बताया गया है.
मतिज्ञान की पराधीन प्रवृति:

ज्ञानावरण - ज्ञान में आवरण करना
मतिज्ञान - मन + इन्द्रिय के निमित्त से जो ज्ञान उत्पन्न होता है
श्रुतज्ञान - शब्द सुनने के बाद अच्छे - बुरे का विचार करना

मतिज्ञान सामान्य है, श्रुतज्ञान विशेष है

मतिज्ञान की पराधीनता कैसे है ?
  • कोई भी जिव को मतिज्ञान ५ इन्द्रिय और मन की सहायता से होता है / जानता है. आत्मा ज्ञान से जानता है परन्तु द्रव्य इन्द्रिय और मन का सम्बन्ध होने पर ही वो जानता है.
  • ज्ञान का क्षयोपशम वही रहेता है परन्तु द्रव्य इन्दिर्य तथा मन के परमाणु अन्यथा परिणमित हुऐ हो तो जान नही सकता अथवा थोड़ा जानता है, क्योंकि द्रव्य इन्द्रिय तथा मनरूप परमाणुओ के परिणमन को और मतिज्ञान को निमित्त - नैमित्तिक सम्बन्ध है, इसलिए उनके परिणमन के अनुसार ज्ञान का परिणमन होता है.

  • ज्ञान को और बाह्य द्रव्यों को भी निमित्त - नैमितिक सम्बन्ध है - लाल काच लगा देने से वास्तु लाल दिखती है अलग - अलग बाह्य पदार्थ से ज्ञान कम - ज्यादा होता है
  • ज्ञान द्वारा जो जानना होता है वह अस्पष्ट जानना होता है, संशय रहित नही होता

इन्द्रिय की मर्यादा:
  • इन्द्रिय द्वारा जितने क्षेत्र का विषय हो उसमे वर्त्तमान सम्बन्धी स्थूल पुदगल जान सकते है , उससे ज्यादा नही जान सकते
  • अलग अलग इन्द्रिय द्वारा अलग अलग काल में किसी स्कंध के स्पर्शदिक का जानना होता है, एक साथ नही जान सकते
  • एक इन्द्रिय दूसरी इन्द्रिय का कम नही कर सकती, अगर आँखे अच्छी हो परन्तु सुन नही सकती सिर्फ़ देख सकती है

मन द्वारा:
त्रिकाल सम्बन्धी, दूर क्षेत्रवर्ती, समिपक्षेत्रवर्ती, रूपी - अरुपी द्रव्यों और पर्यायो को अस्पष्टरूप से जानता है. क्षेत्र - काल की मर्यादा नही है परन्तु अस्पष्ट जानता है

ज्ञान होने के लिए क्या जरुरी है?
  1. मतिज्ञानावरण का क्षयोपशम
  2. चक्षु , अचक्षु दर्शनावरणीय क्षयोपशम
  3. निद्रा क्षयोपशम
  4. विर्यांतराय क्षयोपशम - ज्ञान धारण करने की शक्ति के लिए


1 comment:

Vikas said...

Thanks for posting.
Couple corrections:

श्रुतज्ञान - शब्द सुनने के बाद अच्छे - बुरे का विचार करना

Correction: This definition mostly applies to 5-इंद्रिय संज्ञी जीव OR सु्श्रुतज्ञान (where जीव has कर्ण and मन). बिना शब्द सुने भी श्रुतज्ञान की उत्पत्ति 1-4 इंद्रिय जीवों के पा्यी जाती है, अत: मतिज्ञान से जाने गये विषय के संबंध से अन्य पदार्थ को जानना, उसे श्रुतज्ञान कहते है, ऐसी व्यापक परिभा्षा होगी

निद्रा क्षयोपशम
Correction: निद्रा का क्षयोपशम नहि होता क्योंकि निद्रा के कर्म सर्वघाति ही है. क्षयोपशम के लिये देशघाति के उदय कि आवश्यकता होती है. अत: ज्ञान के लिये निद्रा के क्षयोपशम के बजाय निद्रा के अनुदय की आवश्यकता होती है.