Wednesday, June 25, 2008

class notes of 24th June, ज्ञानहीन जड-पुद्‍गल परमाणुओं का यथायोग्य प्रकृतिरूप परिणमन page no. 28,

प्र० बंध कितने प्रकार का होता है ?
उ० ४ प्रकार का=१ प्रकृति, २ प्रदेश, ३ स्थिति, ४ अनुभाग

प्र० बंध की ४ अपेक्षाये ?
उ० १. प्रकृति= द्रव्य अपेक्षा, २. प्रदेश= क्षेत्र अपेक्षा, ३. स्थिति= काल अपेक्षा, ४. अनुभाग= भाव अपेक्षा

प्र० क्या चारों बंध अलग अलग समय पर होंगे?
उ० नहीं, एक ही समय में चारों बंध एक साथ होगे।

प्र० ७ तत्वों में कौन से तत्व बंध से सम्बंधित हैं ?
उ० आश्रव और बंध तत्व
आश्रव= योग से और बंध= कषाय से

प्र० निमित्त नैमेत्तिक संबंध क्या है?
उ० कारण कार्य संबंध, निमित्त कारण है और नैमित्तिक जो कार्य हुआ। जीव के परिणामों के निमित्त से परिणमन होता है, मंद,तीव्र जैसी कषाय वैसा परिणमन , कर्म कुछ नही करता।

ज्ञानहीन जड-पुद्‍गल परमाणुओं का यथायोग्य प्रकृतिरूप परिणमन

जैसे भूख होने पर तो भूख कषाय और मुख द्वारा ग्रहण किया तो मुख य़ोग हुआ, भोजनरूप पुद्‍गलपिण्ड तो पुद्‍गलपिण्ड प्रदेश बंध हुआ और धातु रूप परिणमन प्रकृति बंध हुआ।उनमें से कई परमाणुओं का सम्बन्ध बहुत काल रहता है और कइयों का कम काल तो ये स्थिति बंध हुआ और कार्यों को उत्पन्न करने की शक्‍ति अनुभाग बंध हुआ।इसी प्रकार सिद्धांत पर घटायेंगे कर्मवर्गणारूप पुद्‍गलपिण्ड प्रदेश बंध, प्रकृति रूप परिणमन प्रकृतिबंध, परमाणुओं का सम्बन्ध कम काल, अधिक काल स्थिति बंध और कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति अनुभाग बंध हुआ।

-> नवीन बंध कैसे होता है ये क्यों जाना इसलिये कि पता चले कि ऐसा क्या पुरुषार्थ करे कि बंध रुक जाय क्योंकि अनादि काल के कर्म बंध तो हैं नहीं जो हैं वो नये नये ही बंध रहे हैं।

सत्ता रूप कर्मों की अवस्था

प्र० सत्ता किसे कहते हैं ?
उ० अनेक समयों में बंधे हुअ कर्मों का जब तक उदयकाल ना आये तब तक जीव के प्रदेशों के साथ अस्तित्व होने का नाम सत्ता है।

प्र० संक्रमण किसे कहते हैं ?
उ० किन्हीं कर्म प्रकृतियों के परमाणुओं का सजातीय अन्य प्रकृति रूप परिणमन होने को संक्रमण कहते है। इसमें विशेष इतना है कि १) मूल प्रकृतियों में आपस में संक्रमण नहीं होता जैसे ज्ञानावरणी दर्शनावरणी मे संक्रमित नहीं होगी, २) चारों आयुओं में आपस में संक्रमण नहीं होता, ३) दर्शनमोहनीय का चारित्रमोहनीय में संक्रमण नहीं होता।

प्र० उत्कर्षण किसे कहते हैं ?
उ० जीव के परिणामों का निमित्त पाकर कर्म के स्थिति- अनुभाग के बढने को उत्कर्षण कहते हैं।

प्र० अपकर्षण किसे कहते हैं ?
उ० जीव के परिणामों का निमित्त पाकर कर्म के स्थिति- अनुभाग के घटने को उत्कर्षण कहते हैं।

-> संक्रमण, उत्कर्षण, अपकर्षण के समय नये कर्म बंध होते रहते हैं।
-> जिस प्रकृति में संक्रमण हो रहा है उस समय उस प्रकृति का बंध होगा ही, जैसे अगर असाता वेदनीय साता वेदनीय में संक्रमित हो रहा है तो साता वेदनीय का ही बंध होगा।
-> उदयावली में होने वाले कर्मों के संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण नहीं होते।

कर्मों की उदयरूप अवस्था

प्र० उदय किसे कहते हैं ?
उ० कर्म की स्थिति पूरी होते ही कर्म के फ़ल देने को उदय कहते हैं।

-> कर्म कार्यों को उत्पन्न नहीं करते, जीव ही उन कार्यों का कर्ता है। कर्ता वह है जो कार्य रूप परिणमित होता है।
-> जीव कषाय रूप परिणमित हुआ, सम्यक्त्व रूप परिणमित हुआ, मोक्ष रूप परिणमित हुआ ऐसा उपादान से कहा। निमित्त अपेक्षा कहते हैं - मैं क्रोध करता हूं तो कर्म बंधे।
-> निर्जरा २ प्रकार की है:-
१) सविपाक निर्जरा= स(सहित), विपाक(फ़ल), कर्मों का फ़ल देकर खिरना सविपाक निर्जरा है।
२) अविपाक निर्जरा= कर्म बिना फ़ल दिये ही खिर जाये

-> प्रति समय समस्त संसारी जीवों को सविपाक निर्जरा हो रही है क्योंकि कर्म का उदय प्रति समय आ रहा है। परन्तु फ़ल देकर जाये वो निर्जरा वास्तविक निर्जरा नहीं है। परमार्थ से तो अविपाक निर्जरा ही वास्तविक निर्जरा है।

-> संसारी जीवों के बंध, उदय, सत्ता प्रति समय है।
-> सिद्ध भगवान के कुछ नहीं है।
-> अरिहंत भगवान के बंध नहीं है परन्तु अघाति कर्मों के उदय व सत्ता है।

2 comments:

Vikas said...

बहुत ही बदिया notes :)

Avani Mehta said...

Very well explained.