Thursday, July 16, 2009

Class Date: 07/15/2009
Chapter: Bhavdipika
Page#: 42 to 46
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que: स्पर्धक किसे कहते है?
ans: शक्ति के छोटे से छोटे अंश को अविभाग प्रातिच्छेद कहते है.
same type के अनेक अविभाग प्रातिच्छेद मील करके एक वर्ग/परमाणु बनता है,
same type के अनेक वर्ग/परमाणु मिल करके वर्गना बनती है,
और उस अनेक वर्गना से मिल कर के स्पर्धक बनता है.
For Example: १० शक्ति के अंशवाले परमाणु का एक वर्ग, ११ शक्ति के अंशवाले परमाणु का एक वर्ग हमारे एक्साम्प्ले जो हमने १० शक्ति के अंशवाले परमाणु का एक लिया है, वहा "अनंत" वर्ग जानना, अनंत वर्गनाजानना, ऐसे ही अनंत वर्गना के समूह को स्पर्धक कहते है.
ऐसे एक-एक बढाते जानेसे एक-एक वर्गना भी बढती जायेगी, और असमे सबसे छोटे अंश वाले वर्गे से जो वर्गना बनती है इसे जघन्य वर्गना कहते है. एक-एक बढ़ने की जो process है it continues until it is double means until it reach from 10 to 19, ये सरे एक ही स्पर्धक कहे जायेंगे, जब ये २० पर पहुचेगा तब नया स्पर्धक कहा जायेगा, जब तक ये १० का tripal 30 तक पहुचेगा तब नया स्पर्धक होगा,

एक स्पर्धक से दुसरे स्पर्धक में शक्ति के अंश अनंतान्त बढ़ते है. इसलिए जघन्य से उत्कृष्ट अनंतान्त स्पर्धक है. और इस स्पर्धको के समूह से गुनहानी बनती है, इस तरह जिव के अनेक कर्मो का बंध और उदय पाया जाता है. जिसमे सबसे ज्यादा सर्वघाती होते है और थोडी मात्र में देशघाती होते है.

@ यहाँ स्पर्धको को मिथ्यात्व के तीन प्रकार से बताया है - मिथ्यात्व, सम्यक्त्व-मिथ्यात्व, सम्यक्त्व
@ अनुभाग की अपेक्षा से 4 type से बताएँगे - शैलरूप, अस्थिरूप, दारुरूप, लतारूप

# अब आगे अनुभाग की अपेक्षा से कितने स्पर्धक शैल, अस्थि, दारू(लकडी), लतारूप होंगे ये बताते है.
- अनंत स्पर्धको के अनंत वे भाग को अलग निकाल के बाकि जो बचा उतने स्पर्धक शैलरूप फल देंगे, जो बहोत ही कठिन होगा, जिसकी फल देने की शक्ति तीव्रतम है, और उसे दूर करने के लिए महापुरुशार्थ करना पड़ता है.
- अब जो एक भाग अलग रखा था उसके अनंत वे भाग को अलग रख कर बाकि जो बचे वह अस्थिरूप फल देंगे, जिसकी कठोरता ऊपर बतये गए से कम है परन्तु तीव्र तो है ही इसलिए उसे हड्डी का नाम दिया है. परन्तु दोनों ही सर्वघाती है.
- अब जो एक भाग अलग रखा था उसके अनंत वे भाग को अलग रख कर बहुभाग स्पर्धक दारुरूप(लकडी) फल देंगे इस स्पर्धको में फल देने की क्षमता अस्थि से कम है, कठोरता कम है. और इसलिए उसे दारुरूप बताया है.
- अब बाकि जो एक भाग अलग रखा था उसके अनंत वे भाग को अलग रख कर बहुभाग स्पर्धक लतारूप है जिसमे फल देने की शक्ति दारू से कम है इसलिए उसे लतारूप कहा है,
- ऐसे शैलरूप, अस्थिरूप, दारुरूप और एक भाग को छोड़ कर के सारे भाग मिथ्यात्वरूप है, दारुभाग के एक भाग को छोड़ कर बहुभाग सम्यक्त्व-मिथ्यात्व, मिश्रभावरूप है.
- दारु का एक भाग और लताभाग के सर्व स्पर्धक सम्यक्त्व प्रकृतिरूप देशघाती है और संपूर्णरूप से जिव के सम्यक्त्व भाव का घात नहीं करता.

# जिसे एक बार सम्यक्त्व हुवा है उसके मिथ्यात्व का बंध तीन part में होगा, मिथ्यात्व, मिश्र, सम्यक्त्व

एकेंद्रिया, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चोंद्रिय,असंग्नी पंचेंद्रिया, और असंख्यात संग्नी पंचेंद्रिया इनमे तो समजने की बुद्धि ही नहीं होना, अपने-अपने विषय-कशायरूप में ही लीन रहेना, ग्राहित मिथ्यात्व पोषण करते है, और निध्य पर्याय में ही निमग्न रहते है, और उपदेश के योग्य नहीं है.

Major स्पर्धक जो उदय में आते है वह दारुरूप होते है जो absolutely तीव्र/मंद नहीं पर मिथ्यात्वई तो है जिससे मिथ्यात्व धर्म को ही सेवता है और सच्चे धर्मं का सेवन नहीं करता. - पंचेंद्रिया जिव जिसके गृहीत मिथ्यात्व(कुदेव, कुधर्मा, कुगुरू श्रधान) के भाव उदय में, मिथ्या धर्मं प्रिय लगता है और उसका ही सेवन करता है. सत्यधर्म से द्वेष करता है. ये गाढ़ मिथ्यात्व है. यह भी उपदेश के योग्य नहीं है

- मंद मिथ्यात्वी जीव गृहीत मिथ्यात्व में मग्न रहेता है, परन्तु आसक्त होकर नहीं सेवता है, और सही उदेश मिलने पर यथार्थ धर्मं को अंगीकार करता है.

# निचली कक्षावाले दारुरूप स्पर्धको के उदयवाले(मिथ्यात्व के उदयवाले स्पर्धकवाला जीव) सत्य धर्मं का उपदेश सुनता है और अयथार्थ धर्मं को छोड़ता है और बुद्धिपूर्वक अनुव्रत आदि को ग्रहण करता है, और सम्यकत्व के पुरुषार्थ में लगता है. और आगे बढ़ता बढ़ता सम्यक्त्व के सन्मुख होता है, और पंचलब्धिरूप भावो को प्राप्त करके, अनिव्रुतिकर्ण भाव को प्राप्त करके दशॅनमोहनिय का उपशम करके सम्यक्त्व को प्राप्त करता है.

# मोह के तीव्र/तीव्रतर उदय पर उपदेश देना भी योग्य नहीं है और वह अकल्याण का कारन, चत्तृगति संसार का कारन, और महापापरूप है, इसलिए मंद उदय में इसमेसे छुटने का जिव पुरुषार्थ कर सकता है और उससे छुट भी सकता है.

1 comment:

Vikas said...

Thanks for summarizing nicely. Few corrections:

अब बाकि जो एक भाग अलग रखा था उसके अनंत वे भाग को अलग रख कर बहुभाग स्पर्धक लतारूप है जिसमे फल देने की शक्ति दारू से कम है इसलिए उसे लतारूप कहा है,
Correction:यहाँ भाग लगाने की जरुरत नहीं है. जो अंत में बचा है, वही लता रूप है. अन्यथा बाकी बचे हुए स्पर्धक किसमे जायेंगे?

जिसे एक बार सम्यक्त्व हुवा है उसके मिथ्यात्व का बंध तीन part में होगा, मिथ्यात्व, मिश्र, सम्यक्त्व
Correction:मिथ्यात्व का बंध तीन नहीं होता, बल्कि वर्तमान मिथ्यात्व ३ भागो में बट जाता है. उसके उपर्युक्त ३ हिस्से हो जाते है.

...में ही लीन रहेना, ग्राहित मिथ्यात्व पोषण करते है, और निध्य ...
Correction:एकेंद्रीय से असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवो के गृहीत मिथ्यात्व नहीं होता. यह बुरे तो संज्ञीयो में ही पायी जाती है.

Major स्पर्धक जो उदय में आते है वह दारुरूप होते है
Correction:किन जीवो की अपेक्षा यह बात है? Please clarify.