Tuesday, November 11, 2008

class notes 11/10/08

जय जिनेन्द्र
अधिकार २ :: चरित्र मोह रुप जीव कि अवस्था

page no : 38,39


Revision:
--> ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म पर हमारा ज्ञान दर्शन कितना पराधिन है यह हमने देखा ,इससे यह बात कि सिध्दि होती है कि ज्ञानावरण और दर्शनावरण से यह जीव बंधा हुआ है जिसके कारण उसका ज्ञान दर्शन प्रगट नही हो पा रहा है।
--> मोहनीय कर्म : २ भेद है।
१) दर्शन मोहनीय: इससे मिथ्यात्व होता है। यह मोहनीय कर्म हमारे कमजोर बनने का सबसे बडा कारण है,इस बात कि समझ ( विश्वास ) हो जाना चहिये। यही हमारा सबसे बडा शत्रु है इसे हमे पहचानना होगा तभी हम इससे बचने का उपाय समझ और कर पायेंगे और सही पथ पर आगे बढ पयेंगे।
२) चारित्र मोहनीय: कषाय की उत्पत्ती होती है, जिसके कारण हमारे कर्म बन्धन होता है और सन्सार चक्र चलता रहेगा।
· दर्शन मोहनीय जब तक है तब तक कषाय रहेगी ही रहेगी।
· कभी दर्शन मोहनीय के बिना कषाय हो भी तो वह बहुत मंद होगी और उसका बन्ध भी मंद होगा।
· मिथ्यात्व सबसे बडा करण है कषाय का।
चार कषाय होती है :क्रोध, मान, माया, लोभ।
१. क्रोध :

प्र. क्रोध क्या है?
उत्तर : अंतर मे किसी भी प्रकार का उल्टा परिणमन वह क्रोध है।
जो प्रगट रुप से दिखाई ना दे परंतु अंतर मे आकुलता होती हो वह भी क्रोध है।

प्र. क्रोध आने के क्या कारण है?
उत्तर: १.जब हमारे अनुसार बात न हो अन्य परिणमन हो तो क्रोध आता है।
२.किसीने हमे कुछ बोल दिया और हमे बुरा लग गया पर उसे प्रगट भले ही ना किया हो तो वह जो बुरा लगा तब क्रोध आया जानना ।
३. कोइ हमे अच्छा नही लगता और अगर हम यह चाहे की उसका बुरा हो जाये तो जहा किसिका बुरा चाहा वहाँ क्रोध आया जानना।

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तथा आप स्वयं ---------------- बुरा चाह्ता है।
यहाँ बताया की क्रोध आता है तब सामने वाले सचेतन या अचेतन पदार्थ ने जो कुछ किया वह हमे गलत लगता है और तब क्रोध के कारण उस किये हुए कार्य या परिणमन को गलत कराके उस कार्य या परिणमन का बुरा चाह्ता है।
क्रोध के कारण कोइ किसिका कितना ही बुरा चाहे बुरा होना, तो भवितव्य (कर्म और बाह्य साधन ) के आधिन है।

प्र. पदार्थ मे इष्ट्पना या अनिष्ट्पना मानना इसका मतलब यह है कि पदार्थ इष्ट या अनिष्ट है?
उत्तर: पदार्थ कभी इष्ट या अनिष्ट नही होते, जीव अपने राग द्वेष रुप विभाव भावों से उन पदार्थो मे इष्ट्पना या अनिष्ट्पना मानता है ।
जब राग होता है तो पदार्थ इष्ट भासित होते है और जब द्वेष होता है तब अनिष्ट भसित होते है ।
उदा: कोइ अपने घर का सदस्य एक ही काम प्रतीदिन करता हो परंतु वह काम कभी राग या अच्छा लगने से इष्ट भसित होते है तो कभी वही कार्य द्वेष भाव से या अच्छा न लगने से अनिष्ट भासित होते है।

** द्वेष से क्रोध होता है:
जैसे पहले कहा कि दर्शन मोहनीय जब तक है तब तक कषाय रहेगी ही रहेगी, द्वेष तो कषाय रुप है. लेकिन मिथ्यात्व अवस्था में द्वेष शीघ्रता हो जाता है जिससे क्रोध कषाय होती है।
२. मान कषाय : मान का उदय होने पर पदार्थ को अनिष्ट मानकर उसे निचा दिखाना चाहता है और स्वयं ऊँचा होना चाह्ता है।
a. अपने आप को लोक मे ऊँचा दिखाने के लिए बहुत श्रंगारादिक करता है धन खर्च करता है ,एसा सोचता है कि अगर मैं एसा नही करुंगा तो लोग समझेंगे कि मेरे पास कुछ नही है तब वह किसी भी तरह अपने मान के लिए स्वय़ं सुंदर दिखे इसलिए श्रंगारादि करता है और धन खर्च करता है।

b. कोइ अगर ऊँचा कार्य करता हो तो वह उसे सुहाता नही और किसी भी तरह वह उसे निचा दिखाने का प्रयास करता है जिससे कि स्वयं ऊँचा सिध्द हो ।
Eg: अगर कोइ १००० रु का दान देता है तो या तो वह स्वयं उससे ज्यादा दान देगा और कहेगा कि देखो मेरे पास उससे कम धन होकर भी मेने उससे ज्यादा दान दिया एसा कहकर स्वय़ं को ऊँचा और उस व्यक्ति को निचा दिखाता है।
या फिर कह देगा कि इसमें कौनसा बडा काम किया इसके पास धन कि कोइ कमी थोडे ही है ।

c. स्वयं कभी निचा कार्य करेगा तो उसे ऊँचा दिखायेगा…
Eg: tax की चोरी करेगा और कहेगा की देखो मेने कितनी चतुराई से tax का गमन किया कि किसी को पता भी नही चला और स्वयं को ऊँचा दिखाने का प्रयास करेगा।

लेकिन यहाँ भी वही सिध्दांत् है कि प्रसिध्दि या महंतता प्राप्त करना भवितव्य आधिन है।

Ø “क्या कहेंगे लोग यही सबसे बडा रोग “ जो मान का ही पोषण करती है।
Ø “छोटे बडे का भाव ही मान का आधार”

प्र. क्रोध और मान दोनो ही पदार्थ मे अनिष्टपना करते है तो दोनो मे अंतर क्या है?
उत्तर: क्रोध मे जीव पदर्थ मे अनिष्ट्पना मानकर उसे नष्ट करना चाहता है,मान मे जीव पदार्थ में अनिष्ट्पना मानकर उसे निचा दिखाकर स्वयं को ऊँचा दिखाना चाहता है।

प्र. मान और क्रोध दोनो एक साथ भी हो सकते है?
उत्तर : एक समय मे एक ही कषाय का उदय होता है। एक कषाय का उदय कमसे कम एक समय और ज्यादा से ज्यादा अंतरमुहुर्त होता है। every कषाय leads each other.

३. माया कषाय : माया का अर्थ होता है छल करना, या मन-वचन-काया का समान न होना (मन मे कुछ,वचन मे कुछ और दिखाना या करना कुछ और ही ), ठ्गना- लोगो को ठगने के अभिप्राय से कार्य करना । अपना अभिप्राय प्रगट ना हो इसलिए अच्छापन दिखाना, अलग२ कार्य करना।

-> क्रोध और मान यह द्वेष रुप है इसलिए उसमें पदर्थोंमे अनिष्टपना होता है।
-> पदार्थों मे इष्टपना होता है, जिसके कारण मायाचार करता है, इसलिये माया राग कषाय है.

a. माया में जीव स्वयं को दु:खी दिखाता है ताकी वह दुसरो से सहानुभुती पा सके और उसके आधार पर लोगो को ठग सके। eg. रावण को सीताजी को पाना था ये तो उसका राग हुआ और उसके कारण उसने छ्ल (माया)से अपना स्वांग बदल कर सीताजी की सहानुभुती प्राप्त कर ली और फिर उनका हरण कर लिया।
b. माया मे स्वयं को ऊँचा दिखाकर भी छल करता है – भले हि स्वयं के पास उतना ना हो फिर भी किसी तरह स्वयं को ऊँचा दिखाएगा ताकी लोग उसे पुछे उस और आकर्शित हो विश्वास कर कभी कोइ धन या किमती वस्तु उसे दे दे तो वह उसे ठगले।

c. माया मे इष्ट की सिद्धी करना चाहता है जिससे वह स्वयं का अच्छा करना चाहता है वहाँ जिससे मायाचार कर रहा है उसका भले ही बुरा हो तो हो उससे उसका कोइ संबंध नहीं।
d. इष्ट की सिद्धी के लिए कुछ भी कर सकता है, किसी भी तरीके को अपना सकता है।
e. मानका पोषण करने के लिए भी जीव मायाचारी करता है क्योंकी यहाँ उसका मान में राग है।

४. लोभ कषाय : पदार्थ को इष्ट मानकर उसे प्राप्त करने की चाह रखना वह लोभ है ।
लोभ भी राग रुप है।

प्र: माया और लोभ में क्या अंतर है?
उत्तर: माया इष्ट्पने से पदार्थ को किसी भी तरह चाहे ठ्गकर हि क्यो न हो उसे पाना चाह्ती है।
लोभ मे जीव को उस पदार्थ मे इष्ट्पना तो होता है परंतु वह उसे राग वश सिर्फ प्राप्त करना चाहता है उसके लिये प्रयास करता है। eg: lobh to earn money

* Lobh in one way it is good as if it is done for our self our soul and it is bad if we do it in other things!!!!
Actually it is good only for the newcomers on mokshmaarg.
लोभ यह सर्वथा बुरा ही है परंतु अगर हम यह कहे की धर्म मे किसी जीव की शुरुवात है और वह अपने आत्मा के प्रति या धर्म के प्रति लोभ करे तो ठिक है वह प्रशस्त लोभ कहलाएगा और जब जीव ७ वें गुणस्थान मे पहुँच जाता है तब वहा यह प्रशस्त लोभ भी बुरा होगा।
अन्य वस्तु या पदर्थो मे लोभ करना वह अप्रशस्त लोभ है


पाँचो पाप कषाय के कारण ही होते है ।
कषाय से पाप रुप कार्य होते है ।

Trupti Jain




Monday, November 10, 2008

19th Nov - चारित्र मोहनीय व अंतराय कर्मोदय जन्य अवस्था - Cont

कषाय [क्रोध, मान, माया, लोभ] धर्म के क्षेत्र में भी पायी जाती है ।
कुछ उदाहरण -
क्रोध - धार्मिक विवादॊं में उलझना, मानवश क्रोध ।
मान - मंदिर में सभी मुझे धार्मिक जानें इस कारण से पूजा / ध्यान / स्वाध्याय / दान आदि करना ।
माया - पूजा / स्वाध्याय में दूसरों को दिखाने के लिये उत्साह दिखाना।
लोभ - धार्मिक क्रीया के पीछे सांसारिक लोभ ।

अंतराय कर्म - जिस कर्म के निमित्त से जीव जैसा चाहे वैसा ना हो । अंतराय कर्म ईच्छित वस्तु की प्राप्ति में विघ्न डालता है ।
भेद - १) दान-अंतराय २) लाभ-अंतराय ३) भोग-अंतराय ४) उपभोग-अंतराय ५) वीर्य-अंतराय

वीर्यांतराय कर्म के उदय वश जीव की ज्ञान-दर्शन आदि अनंत शक्तियां पूर्णत: प्रकट नहीं हो पातीं।

अंतराय कर्म का क्षयोपशम या क्षय होता है ।

Thursday, November 6, 2008

क्लास नवबंर ५ ०८ (प्रष्ट ३८)

दर्शन मोहनीय की ३ प्रकृतियां:

१. मिथ्यात्व - सर्वघाती, १ ला गुणस्थान ।
२. सम्यक मिथ्यात्व (मिऋ प्रकृति) - सर्वघाती, ३ रा गुणस्थान, केवल १ अन्तर मुहुर्त की अवस्था होत्ती है ।
३. सम्यक अवस्था - देश घाती, ४ - ७ वें गुणस्थान में होती है, यह सम्यकत्व मे दोश लगाती है, लेकिन उससे सम्यकत्व बाधित नहीं होता है ।

चारित्र मोह रुप जीव की अवस्था

कषाय
- सम्यकत्व, देश चारित्र, सकल चारित्र को होने नहीं देती है ।
- आत्मा के स्वभाव का घात करती है ।
- राग द्वेष ये कषाय रुप है ।
- आत्मा को कसे अर्थात दुख दे वह कषाय है ।

- पर पदार्थों को अपना मानना ही कषाय का मुल कारण है ।
- एक समय मे एक ही कषाय उतपन्न होती है ।

क्रोध
- क्रोध का उदय होने पर, पर पदार्थों में अनिष्ट पना मानकर उनका बुरा चाहता है ।
- क्रोध का मूल कारण - जब अपने अनुसार काम न हो, अन्य परिणमन हो तब क्रोध आता है ।

मान
- मान घमंड को कहते है ।
- पर पदार्थों में अनिष्टपना मान कर उसे नीचा करना चाहता है, स्वयं ऊंचा होना चाहता है ।

Wednesday, November 5, 2008

दर्शन मोहरूप जीव की अवस्था, page 38, date 4th Nov.

-->मॊहनीय कर्म के २ भेद :-
१) दर्शन मोहनीय--> के उदय से मिथ्यात्व
२) चारित्र मोहनीय--> के उदय से कषाय

प्र० मिथ्यात्व किसे कहते है?
उ० जीव के अतत्वश्रद्धानरूप परिणमन को मिथ्यात्व कहते है अर्थात विपरीत या उलटी मान्यता ही मिथ्यात्व है। जैसे देव, शास्त्र गुरु के सम्बन्ध में उलटी मान्यता या सात तत्वों, छः द्रव्यों के सम्बन्ध में उलटा जानना आदि।

मिथ्यात्व अवस्था में जीव स्व-पर का भेद नहीं कर पाता। जैसे स्व अर्थात ज्ञानादिक गुण जो कि स्वयं आत्मा के हैं और आत्मा अमूर्तिक है। और पर अर्थात स्व की आत्मा को छोडकर जितने भी पदार्थ हैं सब पर हैं। तो मिथ्यात्वी जीव शरीर आदि पुद्गल जो पर हैं उनको अपना मानता है उनमें अहंबुद्धि धारण करता है कि ये शरीर मेरा है, मैं गोरा हूं, मैं लडका हूं, मैं वकील हूं आदि। मनुष्य पर्याय में रहे तो उसी पर्याय को अपनी मानता है और तिर्यंच पर्याय को बुरा मानता है और तिर्यंच पर्याय में तिर्यंच पर्याय को अपना मानता है।

स्वभाव परभाव का विवेक नहीं कर पाता। जैसे ज्ञान, दर्शन, चैतन्य जीव के स्वभाव हैं अपने गुण हैं। और राग द्वेष आदि कर्मों के निमित्त से औपाधिक भाव हैं अर्थात विभाव भाव हैं। तो मिथ्यात्वी राग द्वेष आदि विभाव भावों को अपना मानता है। वर्णादिक अर्थात शरीर के गुण जैसे गोरा-काला, बडा छॊटा, मोटा-पतला, जवानी-बुढापा, ठंडा गर्म लगना, ये सब पुद्गल परमाणुओं का आना जाना होता रहता है जिससे ये सब अवस्था होती हैं उनको उस रूप न जानकर सब को अपना स्वरूप मानता है। अन्य बाह्य पदार्थ जैसे धन-कुटुम्ब आदि को अपना मानता है जब कि ये प्रत्यक्ष भिन्न दिखाई देते हैं परन्तु उन सब को मानता है कि ये मेरे हैं।
इस प्रकार ऊपर लिखी सब अवस्था अगृहीत मिथ्यात्व में आती हैं।

मिथ्यात्व के २ भेद:-
१) अगृहीत मिथ्यात्व--> अनादिकालीन विपरीत मान्यता
२) गृहीत मिथ्यात्व--> जो भी वर्तमान पर्याय में नया सुनकर या उपदेश द्वारा विपरीत ग्रहण किया है। जैसे किसी उपदेश से कल्पित रागी द्वेषी देवताओं को कल्याणकारी मान लेना।

--> गृहीत मिथ्यात्व संज्ञी पंचेन्द्रिय को पाया जाता है उसमें भी मुख्यतया मनुष्य पर्याय में पाया जाता है।

प्र० दोनों मिथ्यात्व में से पहले कौन सा मिथ्यात्व जायेगा?
उ० पहले गृहीत मिथ्यात्व जाता है क्योंकि नवीन अर्जित गृहीत मिथ्यात्व के त्याग के बिना अगृहीत मिथ्यात्व नहीं छूटता। गृहीत मिथ्यात्व का त्याग करना मनुष्य के अपने आधीन है क्योंकि उसने उसे अपने अज्ञान भाव से ग्रहण किया है अतः अपने ज्ञान भाव से छोड भी सकता है।

दर्शन मोहनीय का जहां तीव्र उदय होता है अर्थात तीव्र अनुभाग सहित उदय होता है वहां बहुत विपरीत श्रद्धान करता है, और जहां कम उदय या कम अनुभाग सहित उदय होता है वहां थोडा विपरीत श्रद्धान करता है।

दर्शन मोहनीय के सर्व घाति स्पर्धक ४ प्रकार के हैं:-
१) शैल= पाषाण(पत्थर)
२) अस्थि= हड्डी
३) दारु= लकडी
४) लता= बेल

शैल और अस्थि १-५ इंद्रिय असैनी पंचेन्द्रिय के होते हैं अर्थात उसमें इतना तीव्र उदय होता है कि वो सुन भी नहीं पा रहा, उसको कुछ सुनने को भी नहीं मिल रहा, सुनने की योग्यता ही नहीं है, उपदेश की अपात्रता पर्याय अपेक्षा है।
दारु संज्ञी पंचेन्द्रिय को होते हैं अर्थात उस जीव को सुनने की योग्यता तो है परन्तु सुन नहीं पा रहा, उसको उपदेश की अपात्रता उपदेश सुनने की अपेक्षा है।

Tuesday, November 4, 2008

11/3/08 chapter 2, मोहनीय कर्मोदयजन्य अवस्था, पेज 37

मन:पर्ययज्ञान के भेद:
१.ऋजुमति ज्ञान:
-दुसरे के मन मे स्थित होने पर भी जो सरलतया मन, वचन, काय के द्वारा किया गया हो, ऎसे पदार्थ को विषय करने वाले ज्ञान को ऋजुमति ज्ञान कहते है ।
-वर्तमान में जिसका चिन्तवन किया जा रहा है ऎसे त्रिकाल विषयक रुपी पदार्थ को ऋजुमति ज्ञान जानता है ।
अर्थात वर्तमान में जो भूत, भविष्य तथा वर्तमान के बारे में जो सरल रुपी पदर्थो का विचार ऋजुमति ज्ञान का विषय है।
२. विपुलमति ज्ञान :
दुसरे के मन में स्थित भूत, भविष्य, वर्तमान में जिसका चिन्तवन किया जा रहा हो ऎसे सरल अथवा कुटिल विषयों को विषय करने वाले ज्ञान को विपुलमति ज्ञान कहते है ।

* अवधि ज्ञान व मति ज्ञान में अंतर:

प्रश्न: अवधिज्ञान के बाद मन:पर्यय ज्ञान को क्यों रखा?
उत्तर: - मन का विषय ज्याद सूक्ष्म है ।
-मन:पर्यय ज्ञान मोक्ष अ केवल ज्ञान के समीप है, इसलिये उसे अवधि ज्ञान के बाद रखा।

प्रश्न: बुढापे में मति,श्रुत ज्ञान कम क्यों हो जाता है?
उत्तर:- पूर्व में बहुत संक्लेश परिणाम करने के कारण कषाय की तीव्रता से क्षयोपशम कम हो सकता है।
- शरीर नामकर्म के उदय से।
- इन्द्रियों में शिथिलता आ जाने के कारण।

प्रश्न: नींद में ज्ञान उत्पन्न होता हुआ मालुम पढता है, किन्तु दर्शन तो होता नहिं है क्योंकि निद्रा का उदय चल रहा है और निद्रा सर्वघाति है. सो ज्ञान कैसे होता है?
उत्तर: - पहले उस वस्तु का दर्शन हो चुका है।
- निद्रा प्रक्रति का उदय maximum अन्तर्मुहुर्त में होता ही होता है, उसके बाद उसमें gap होगा ही होगा । तो जब निद्रा प्रक्रति का उदय नहीं है तब दर्शनोयोग हो जायेगा।
इसी प्रकार जब हम जागते रहते है तब निद्रा का उदय सूक्ष्मरुप है, व्यक्त नहीं है इसीलिए दिखाइ नहीं देता।

पेज ३७: अब इस जीव के मोहनीय कर्मोदयजन्य अवस्था:

* दर्शन मोह के उदय से मिथ्यात्ब भाव होता है।
*चारित्र मोह के उदय से कषाय भाव होता है।

दर्शनमोह रुप जीव की अवस्था:

*आत्मा अमूर्तिक प्रदेशों का पुंज है, वह science आदि के द्वारा नहिं जाना जा सकता, प्रसिद्ध ज्ञानादि गुणों का धारी है, अनादिनिधन है, वह स्व है ऎसा प्रत्येक जीव का स्वरुप है।

* जो मूर्तिक है, पुदगल है ये शरीर आदि तथा उसके संयोग से प्राप्त पदार्थ, पर्यायें, ये ज्ञानदि से रहित है, पर है।

* सो इन पर पदर्थों के संयोग से जो पर्यायें उत्पन्न्न हो रही है उनमें ये मैं ही हूं, जो न तो जीव है न तो पुदगल है, उससे जो mix state बनी है उसमें अहंबुद्धी करता है, स्व पर का भेद नहीं कर पाता है ।
सो इस प्रकार यह जीव विपरीत श्रद्धान रुप प्रवर्तन करता है।

Thursday, October 30, 2008

Notes from October 29th, 2008 , page # 36-37

*
-> ज्ञानावरण और दर्शानावरण का उदय तो ज्ञान और दर्शन के अंश का अभाव करता हे।
-> उनका (ज्ञानावरण और दर्शानावरण ) क्षयोपषम से ज्ञान और दर्शन के अंश प्रगत होते हे।
-> इस तरफ़ ज्ञान और दर्शन की शक्ति प्रगटता ज्ञानावरण और दर्शानावरण के क्षयोपषम के सापेक्ष हे।

*
-> क्षयोपषम से शक्ति प्रगट होने पर भी उस शक्ति का संपूर्ण १००% उपयोग/सदभाव एक समय मे नही होगा।
-> एक समय मे सिर्फ़ एक विषय या तो दीखता हे या जाना जाता हे। यानी ग्यानोपयोग होगा तब दर्शानोपयोग नही होगा। दर्शानोपयोग होगा तब ग्यानोपयोग नही होगा।
-> अरे ग्यानोपयोग होगा तो उसमे भी एक ही भेद मे उपयोग होगा। द्रष्टान्त: मति ज्ञान हो तो श्रुत ज्ञान नही होगा।
-> उस एक भेद का भी एक ही विषय जान पायेगा। रस को जानेगा तो स्पर्श को नही जानेगा।
-> एक विषय के भी एक ही अंग को जानेगा। उष्ण स्पर्श को जानेगा तब रक्षा आदि स्पर्श को नही जानता।

* प्रश्न:
-> एसा भास् क्यो होता हे की युगपत कई सारे विषयो का जानना और देखना हो रहा हे।
-> ग्येय के बदलने की चंचलता काफ़ी अधिक मात्रा मे पायी जाती हे, इस लिए परिणाम की सिध्रता से एसा मान लेता हे।

* प्रश्न:
-> अगर एक समय मे एक ही बिषय को जान या देख सकते हे तो उतना ही क्षयोपषम हे एसा क्यों नही कहते?
-> व्यवहार मे भी शक्ति होने पर जरुरी नही हे की उस शक्ति का उपयोग हो ही। इसी तरफ़ ज्ञान या दर्शन की शक्ति पाये जाने पर भी वर्तमान पर्याय मे उस का उपयोग न भी हो।

* प्रश्न:
-> एसा कहते हे की मति ज्ञान आदि की शक्ति ज्ञानावरण के क्षयोपषम से ही पाई जाती हे तो आत्मा मे तो केवल ज्ञान की भी शक्ति पायी जाती हे, वोह कहा क्षयोपषम से होती हे?
-> केवल ज्ञान तो आत्मा मे त्रैकालिक शक्ति के स्वरुप मे हे और वोह तो द्रव्य अपेक्षा हे। जब की ज्ञानावरण के क्षयोपषम से जो भी मति ज्ञान आदि हे वोह तो आत्मा मे वर्तमान पर्याय मे सामर्थ्य स्वरुप शक्ति के रूप मे हे।
-> अगर संसारी छद्मस्थ जीव पुरुषार्थ करे तो उपयोग स्थिर करने पर वर्तमान पर्याय मे व्यक्त मति ज्ञान को प्रगट कर सकेगा। जब की केवल ज्ञान तो छद्मस्थ जीव मे अव्यक्त हे तो फिर प्रगट कर ही नही शकता, पहले तो पुरुषार्थ करके उसे ज्ञानावरण के आवरण को दूर करना पड़ेगा तब जाके केवलज्ञान व्यक्त होगा।

* प्रश्न:
-> क्षयोपषम होने पर भी अगर बाह्य इन्द्रिया का निमित्त ना मिले तो देखना या जानना नही होगा तो कर्म की ही निमित्तता कहा रही?
-> यह कर्म के क्षयोपषम का ही विशेष हे यानी कर्म का क्षयोपषम ही इस प्रकार का हे की उसे बाह्य द्रव्यों का निमित्त मिलेगा तो ही देखेगा या जानेगा।
-> द्रष्टान्त: मनुष्य को अन्धकार मे नही दिखेगा जब की उल्लू को उसी अन्धकार मे ही दिखेगा - सो यह क्षयोपषम का ही विशेष हे।

Tuesday, October 28, 2008

Notes from class of October 28, 2008

Notes from class of October 28, 2008
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Q. Why we celebrate Diwali?

Es din pe Mahavir bhagawan ka nirvaan hua es liye Diwali ka din bhagwan Mahavir ka nirvan kalyanak hai. But according to Hindu manyata, they celerate Diwali due to Ramchanraji's arrival in Ayodhya.

Q. Are we happy on Diwali - Yes!! But kya hame kushi honi chahiye yaa dukh?

We lost our last thirthankar and now there won't be any divya dhvani for us. Ye bhagwan ke liye happy occasion hai but hamrare liye to bahut unfortunate din hai.. Ye hamare liye happy hai yadi hum jane hum diwali kyu manate hai and bhagwan mahavir ka sandesa jivan me utare but yadi hum laukik way se celebrate kare to ye hamare liye bahut dukh ka din hai.

Q. What abt dhan teras?

Hum lakshmi / dhan pujan karte hai but eska vidhan Jainism me nahi hai. It is actually dhanya teras because ek din pehle yog nirodh hua - it is the last divya dhwani, samvasharan vighatit ho gaya. Yog nirodh is 14th gunstanak ke pehle ki prakriya- 14th is ayogi gunsthanak. Yog nirodh can last for several days, one day or a few seconds depending on the karmas of the tirthankar.

Q. hum light and candle kyu jalate hai?

Dipak gyan ki jyoti ka symbol hai. Hume moh ke andhkar ko nash karke kevalgyan ki prapti karni hai - deepak will destroy darkness of moh and mithyatva. We should do mahavir swami’s and gautam swami’s puja - but not lakshmiji or ganpatiji’s puja. Yeh grahit mithyatva badhata hai.

Page 35- Avdhi gyan, Manah paryay gyan or Keval gyan ki pravrutti:

Avdhi gyan ki pravrutti rupi padarth mein spasht hoti hai. Avdhi means limit/maryada. The limit is dravya, kshetra, kaal bhaav. It is found in dev and naarki for everyone (bhav pratyay- Avdhi gyan kaa kshayopsham automatically happens in this bhav - no special effort required). In manushya and tiryanch it is not found in everyone. Sangni panchendriyas have the potential for Avdhi gyan. Samyaktva ki jarurat nahi hai for Avdhi gyan.


Q. Kya narki aapne purvabhav ko jante hai?

Narki ko bahut limited Avadhi gyan hota hai aur kshetra ki maryada ke karan wo nahi jaan sakte. But, khabhi unko jaati smaran gyan ho or dev unko remind kare to wo jaan sakte hey lekin apne Avadhi gyan se nahi.

Whatever we remember abt yesterday is due to mati gyan - even then it is very sthul and we do not remember any details. Esi liye ye Avdhi gyan nahi hai. Jaati smaran is a type of mati shrut gyan since it is not very clear or pratyaksh/spasht. Devs have the most avdhi gyan but unme bahut mithyatve hota hai - Wo vishay sukh me lin rehte hai hence unable to achieve samyaktva. It is similar for us also - we know everything here is temporary yet we are unable to attain virakti from vishay shukh.

Avdhi gyan ke three types - Deshavdhi, Parmavdhi and Sarvavdhi. Gun pratyay and bhav pratyay are the types of Deshavdhi. The other 2 are found only for manushya and that also only sanyami munis. Only deshavdhi can be found for all jeevs. Therefore Gun pratyay avdhi gyan can be found in all 3 types but Bhav pratyay avdhi gyan is found only in sayami muniraj.

Manah paryay gyan can be found only in 6th-12th gunsthanak only in sanyami muniraj. Also unko 64 riddhis me se koi ek riddhi honi chahiye and unka charitra uttam hona chahiye. So yeh gyan unko hi hota hai jo moksh ke right track (najadik) par hai.



-Harshil