Wednesday, January 13, 2010

MMP Class Notes - January 12th, 2010

Class Date:01/12/10
Chapter:7
Page#:225
Paragraph #: 1st para
Recorded version:
Summary:

इस से पहेले हमने देखा कि हमे प्रतिकुलता मे भेद विग्य़ान करना हे, कर्ताभाव छोडना हे एसा याद आता हे लेकिन फ़िर से अनुकुलता आते हि हम भुल जाते हे कि हम रोग ग्रस्त हे, इस तरह भेद विग्यान को सही मे तो हम ग्रहण ही नही करते.

व्रत, नियम, आदि लेना तो हे लेकिन उससे पहेले य उसके साथ भेद विग्यान करना हे और इस भेद विग्यान रुप भाव को भासित करते हुए उसे चारित्र मे लाना हे, यह काम बिना कोइ पर कि सहायता से हो शकता हे.

ग्यान भी रटने रुप आया हे और भाव भासन रुप नही आया, यहा ग्यान को गौण करने कि बात नही हे. "जीव जुदा - पुदगल जुदा" यह एक वचन को जानकर सिर्फ़ उससे तुम्हे भाव भासित हो जाये तो वोह थीक हे या उसके विस्तार को जानकर तुम भाव भासित करो, दोनो मे प्रयोजन तो एक हि हे कि भाव भासित करना हे. हमारी उत्साह कि कमी को मुख्यता से दूर करनी हे.

शिवभुति मुनि शब्दो का ग्यान नही था लेकिन उन्होने शब्दो से ज्यादा ध्यान शरिर-आत्मा के भेद पर दिया तो केवली हुये. यहा पढाइ के पिछे सिर्फ़ प्रोफ़ेसर या टीचर की तरह "educational language or history related research" का नही हे. हम धार्मिक प्रयोजन से पढते हे, मोक्ष और धर्म कि रुची भी हे, फ़िर भी हित-अहित का विवेक द्रढ हो नहि पाता, स्व-पर के भेद विग्यान पर द्रष्टि नही जाती, जो करने का प्रयोजन था वोह ही नही हो पाता, यह केसी विचित्रता हे, और कितने दुख कि बात हे. यह एक गंभीर समस्या हे और इस पर विचार करने कि जरुरत हे कि क्यो एसी भुल रह जाती हे.

अब जीव-अजीव तत्व का अन्यथारुप :

हम जीव के अलग-अलग भेद जानते हे, पुदगल के भेद जानते हे. यहा हम यह ग्यान शास्त्र के माध्यम से हि जानते हे और याद भी रखते हे लेकिन यह भेद जानकर भेद विग्यान किया कि नहि? जो जिव के भेद जाने, उस भेद्रुप मे खुद जिव हु, और पुदगल रुप में नही हु एसा खुद पर घटाया ही नहि.

द्रव्यानुयोग मे जो अध्यात्म शास्त्र हे वोह निश्चय - व्यवहार शैली से आत्मा कि रुचि कराने के प्रयोजन से आत्मा कि बात मुख्यता करते हे. और आगम शास्त्र वस्तु व्यवस्था का निरुपण करने के साथ जिव कि बात मुख्यता करते हे. यहा जिव यानी समस्त जिव, समग्र जिव जाती, जिव यानी पर्याय रुप भावरुप जिव, जब कि आत्मा यानी में, खुद की बात हे, आत्मा यानी त्रिकाली ध्रुव शुध्ध आत्मा.

पहली समस्या यह हे कि अध्यात्म शास्त्र पढते हि नहि, निश्चय कि बात हे इसलिये नही पढना, या श्रावक अवश्था मे व्यवहार की मुख्यता हे तो निश्चय कि जरुरत ही नही एसा मानते हे. दुसरी समस्या यह हे कि पढ तो लिया और अच्छी तरह से द्रढ श्रध्धान भी कर दीया के त्रस - स्थावर जिव क्या होता हे लेकिन में त्रस - स्थावर रुप हु कि नही या में इन पर्याय से उपर उठ्कर भी कुछ हु एसा तो सोचा ही नहि.

राग-द्वेश रुप परिणमन भी मेरा और ग्यान रुप परिणमन भी मेरा एसी जो मिश्रित मान्यता थी उस पर यह ग्यान लगाना था और मान्यता बदल जाये एसा पुरुशार्थ करना था. एक कार्य होने मे मेरा हिस्सा कितना और दुसरे का, पुदगल का हिस्सा कितना वोह सोचना हे, पर का अंश खुद मे मिलाकर हम मे कर्ताभाव कि बुध्धी हंमेशा चलती रहती हे.

हमने चोथे प्रकरण मे देखा था कि अग्रहित मि. द्रष्टी को कोइ निर्धार बिना सिर्फ़ पर्याय बुध्धी से जानपने मे, शरीर मे, राग-द्वेश मे सब मे अहंबुध्धी होती हे. यहा ग्रहित मि. द्रष्टी भी आत्माश्रित ग्यान मे और शरिराश्रित क्रिया मे अपन्त्व ( मम्त्व , कर्तुत्व , भोक्तुत्व ) कि बुध्धी रखता हे. अग्रहित मिथ्यात्वि शुभ-अशुभ दोनो को मेरे रुप जानता था, यहा ग्रहित मिथ्यत्वि सिर्फ़ शुभ को मेरी क्रिया एसा जानता हे और अशुभ को तो बुरि जानकर छोडना चाहता हे.

मुख्य बात यह हे कि भोजन ले या ना ले, आसक्ति से भोजन करे या उपवास करे यह शरीर की क्रिया हे, भोजन का एक दाना भी आत्मा मे नही जाता. शास्त्र पढकर भी भुल रह जाती हे.

Tuesday, January 5, 2010

MMP Class Notes - देव भक्ति का अन्यथारुप - धर्म बुध्धि से धर्मधारक व्यवहाराभासी मे सम्यगदर्शन का अन्यथारुप

Class Date: 12/28/09, 12/29/09, 12/30/09, 01/04/10
Chapter:7
Page#:229-230
Paragraph #: मेईन टोपीक: धर्म बुध्धि से धर्मधारक व्यवहाराभासी मे सम्यगदर्शन का अन्यथारुप, सब टोपीक: देव भक्ति का अन्यथारुप
Recorded version:
Summary:

सम्यग दर्शन की एक परिभाषा यह हे कि : देव, गुरु, शास्त्र का सच्चा श्रध्धान = सम्यकत्व.
यहा जीव अन्य कुदेव आदि को रंजमात्र भी नही सेवता लेकिन सुदेव आदी कि परिक्षा नही करता के सुदेव के गुण क्या हे और केदेव आदी के गुण-अवगुण क्या हे और अगर परीक्षा करता हे तो भी सिर्फ़ बाह्य लक्षण से करता हे, तत्वग्यानपूर्वक नही करता.

देव भक्ति संबंधी भूलें:

प्रथम भुल:

देव के बारे मे अनेक विशेषण, अनेक गुण आदि हम जानते हे लेकिन उन गुणो में जिवरुप गुण य पुदगलरुप गुणो को भिन्न भिन्न नही देखते हे. देव केवलग्यान धारी हे और सफ़ेद खुन धारी हे, इन दोनो गुणो को एक ही केटेगरी मे रख देना यानी कि हमने देव को यथार्थ रुप से जाना ही नही.
 जो शरीर आश्रित, अन्य पुदगल आश्रित और नगर या कुटुंब आश्रित गुण होते हे उनका निषेध नही हे या उनका अपमान भी नही करना हे, वोह पुज्य हे लेकिन उनका अतिरेक भी नही करना हे. अनंत चतुष्टय आदि आत्मिक गुण / अंतरंग के गुण हे उसकि महिमा को यथार्थ रुप से जानना हे.

यहा दुसरी बात यह हे कि उन जिव रुप गुण या पुदगल रुप गुण के बारे मे कोइ विचार नही किया और सिर्फ़ आग्या से उन्हे जान लिया. उन गुणो के कारन देव का महंतपना क्यों हे वोह भी नही सोचा, सिर्फ़ आग्या से देव को बडा मान लिया.

तिसरि बात: इन गुणो को जानने कि कोशिश करी तब भी बराबर/यथार्थ नही समजा. यह सोचा हि नकी कि जो आत्मिक गुण हे देव के वोह गुण देव में होने चाहिए कि नही, अगर ना हो तो उससे क्या बाधा आ शकती हे या जो पतित्पावन, दिनदयाल, मोक्षदाता आदि विशेषण हे उसका शाब्दिक अर्थ मान लिया, एसा होने पर देव मे वितरागता रहती नही एसा सोचा ही नहि और उन विशेषणो को उपचार से समजना था वोह नही किया, इस तरग देव क स्वरुप सही तरिके समजा ही नही.

दुसरी भुल:

अरिहंत आदि कि कथा मे उनके नाम, पुजा आदि से स्वर्ग, मोक्ष मिल जाता हे एसी बाते आती हे और मोक्ष दाता आदी विशेषणो के कारन जिव देव को कर्ता मान लेता हे. यहा तो कार्य होने में प्रभु के नाम स्मरण आदी के और जीव के परिणाम शुभरुप होने मे जो निमित्त-नैमित्तिक संबंध होता हे उसमे अरिहंत के नाम आदी निमित्त की उपचार से महत्ता दिखाते हे. यहा प्रयोजन तो सिर्फ़ एक हि हे कि तिव्र कषाय वाला जिव मंद कषाय कि तरफ़ बढे और उसे धर्म के रास्ते पर ला सके. यहा कोइ शोर्टकट की तो बात हि नही, पुरे जिवन पाप करते रहो और अंत मे प्रभु के नाम स्मरण से पा धुल जायेंगे एसि व्यवस्था हे ही नही.

भक्ति मे कर्तुत्व पने की भाषा उपयोग मे लि जाती हे. लेकिन मान्यता मे तो यथार्थ समज होनी हि चाहिए. महमान को "आप का ही घर हे" एसा कहते हे लेकिन मानते तो अलग हे. अगर भगवान को कर्ता ना माने और सब बोज कर्म पर डाल दे तो वोह भी थीक नही.

तिसरी भुल:

अरिहंत कि भक्ति, पुजा आदि धार्मिक क्रिया करने से अनिष्ट का नाश / इष्ट क मिलना होता हे. पहले तो धर्म आत्मा के लिये करना हे , सांसरिक प्रयोजन के लिये नही. सांसरिक प्रयोजनार्थ धर्म करने वाला धर्म से लौकिक वस्तु मांगता हे और यहा तुम धर्म से पुण्य मांगते हो और फ़िर उस से काम हो जायेगा एसा मानते हो. पहेलेवाले को हित-अहित कि बुध्धि हि नहि हे और तुम्हे हित-अहित कि भावना हे लेकिन वोह सम्पुर्ण तरह से यथार्थ नहि हुइ हे अभी.

धार्मिक क्रिया के समय जिव के जो परिणाम शुभ और शुध्ध कि तरफ़ बढते हे उसके कारण संक्रमण आदी होते हे और उसमे क्रिया सिर्फ़ निमित्त रुप मात्र हे यह समजना हे. फ़ल तो परिणाम कि शुध्धता से हे, अगर लौकिक प्रयोजन रुप परिणाम हे तो फ़िर तो संक्रमण भी नही होगा.

चौथी भुल:
भक्ति हि मोक्ष का कारण हे. भक्ति मे राग हे और राग तो बन्ध का कारण हे तो फ़िर भक्ति मोक्ष का मुख्य कारण केसे हो शकती हे? भक्ति मे शुभ भाव हे और मोक्ष तो शुध्ध भाव से हे , शुभ से नही. यह समज पक्की होनी चाहिये.

इसका यह मत्लब नही के भक्ति ना करे. भक्ति करने से अशुभ का राग कम होता हे और कषाय मंद होती हे, इस तरह भक्ति परोक्ष कारण हे इस लिये सर्वथा निषेध नही हे लेकिन उसि से ही संतुष्ट नही हो जाना हे. अन्य बाह्य साधन कि तरह उसका आश्रय लेना हे और अशुभ से शुभ मे आना हे और फ़िर जब शुभ से शुद्ध के तरफ़ जाने लगे तब उसे छोडना भी हे. लक्ष्य तो शुध्धोपयोग का ही हे.

ग्यानी या अग्यानी किसि का भी अनुराग बाह्य मे ज्यादा या कम दिख शकता हे लेकिन ग्यानी का श्रध्धान ठिक हे और वोह भक्ति को भी शुभ बंध का कारण जानता हे. उसका अनुराग तीव्र नही हे लेकिन यथार्थ समज के साथ हे.

अन्य बात: देव पुजा:
किसकि करेंगे: ग्यान और वैराग्य पुज्य हे...
कौन करेगा: जिस को ग्यान-वैराग्य मे सच्चा श्रध्धान हे एसा श्रध्धावान
कैसे करेंगे: गुण अनुराग ही पुजा हे
फ़ल क्यां मिलेगा: सच्चा निर्मल सुख

अन्य बात: भाव दिपिका से:
हमने पहले देखा था कि दिर्फ़ एक देव को महत्व देन,  और अन्य तिर्थंकर आदी के प्रति उत्साह न होना यह भी भुल हे और देव का सच्चा स्वरुप नही समजा. उसी तरह अरिहंत और सामान्य केवली मे बाह्य भेद होने पर भी अंतरंग सुख मे कोइ भेद नही , यह समजने की बात हे.

अन्य बात:
अगर अरिहंत में आत्म शरीर आदि अलग-अलग जाने तो खुद को भी आत्मा रुप जान शकेंगे. स्व-पर भेद विग्यान से अरिहंत को जान, खुद पर घटाने से, देव का सच्चा सवरुप प्रतिति मे आने से हमारि मिथ्या द्रष्टि दुर होगी. इस तरह देव भक्ति का सच्चा स्वरुप सम्यग द्रष्टि का कार्ण हे.

Monday, December 14, 2009

Re: MMP Class Notes - परिक्षा रहित आग्यानुसारी धर्मधारक व्यवहाराभासी

Class Date:12/07/09,12/09/09, 12/14/09
Chapter:7
Page#:215-218
Paragraph #: परिक्षा रहित आग्यानुसारी धर्मधारक व्यवहाराभासी
Recorded version:
Summary:

यहा जीव शास्त्र पढता हे और उसे आग्या समजकर मान लेता हे, जो लिखा हे उसकी परिक्षा कर के उस ग्यान को ग्रहण नही करता. यहा परिक्षा जिन वचन कि सत्यता की करनी हे. उनमे शंका या तर्क हे के नही वोह बात नही हे, यह परिक्षा तो खुद के श्रध्धान के लिये हे. खुद को सच्ची प्रतिति नही हुइ हे तब तक तो जो मान्यता हे वोह सिर्फ़ पक्ष मात्र से ग्रहण करी हे एस होगा. जो सत्य सिर्फ़ पक्ष पर आधारीत हो वोह तो एकान्त हुआ.

इस तरह खुद परिक्षा करे और खुद को एहसास हो कि यह बात सत्य हे तब द्रढ श्रध्धान होता हे, इस लिये खुद को युक्ति / तर्क का अवलंबन लेकर परिक्षा कर पक्षपात बुध्धि निकाल सत्य का निर्णय करने के लिये खुला मन रखना हे. सत्य का पक्षपात करना हे, ना कि पक्ष का पक्षपात.

पंडितजि कहते हे कि धर्म में दो प्रकर हे कथन होते हे, स्थुल कथन कि जिनकी प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा परिक्षा कर शकते हे और सुक्ष्म कथन जिन का निर्णय हमारे वर्तमान के मर्यादित ग्यान और अल्प बुध्धि के कारण कर शकना शक्य नही हे. यहा सुक्ष्म कथन तो आग्या से मानना हे और सिर्फ़ स्थुल का निर्णय करना हे.

जो अनेक नाना शास्त्रो में सामान्य या कोमन बातें हे उनकी परिक्षा कि बात नही हे लेकिन जो विरुध्ध बाते हे उनमे दो प्रकार हे एक तो वोह जो सही मे विरुध्ध हे और दुसरी वोह जिस मे उपर-उपर से विरुध्ध दिखे लेकिन वास्तव में हे नही, यहा नय-प्रमाण लगाकर परीक्षा करनी हे.

आधुनिक विग्यान का आधार लेकर भी परीक्षा नही करनी हे. या उसके साथ शास्त्र कि बात मेल खा रहि हे कि नहि यह कुछ परीक्षा नहि हे. इस मे तो यह मतलब हुआ कि आधुनिक विग्यान पर श्रध्धान हे और जिन मत पर श्रध्धान नही हे. यहा जिन के वचनो को इन्द्रिय गोचर ग्यान से साबित करने कि बात तो हे हि नहि. आज काल बच्चो को विग्यान के आधार से जैन मत को साबित कर के फ़िर उसे मनाया जाता हे वोह सही रास्ता नही हे. विग्यान का निशेध नही हे लेकिन सिर्फ़ उसको  हि आधार बनाना मुनासिब नही हे. विग्यान तो सिर्फ़ साधन हे , धर्म रुप साध्य का, यहा तो धर्म को हि साधन बना दिया, और इस से विग्यान कि महत्ता धर्म से ज्यादा हे वोह भी भासित होता हे. अंतरंग से परिक्षा करनी हे, उससे अंतरंग कि महिमा आती हे.

यहा कोइ प्रश्न करे कि आग्या पालन तो धर्म ध्यान का एक प्रकार हे, नि:शंका सम्यकत्व के आठ भेद में से एक हे और आग्या सम्यकत्व एक प्रकार का सम्यकत्व हे तो फ़िर आग्या मानना हि तो धर्म हे, परिक्षा क्यो करे?

उत्तर मे कहते हे कि जो आग्या सम्यकत्व और आग्या विचय धर्म ध्यान कि बात करि हे उसमे आग्या सिर्फ़ मान लेने का नाम सम्यकत्व या ध्यान नहि हे, बल्कि वितराग और सर्वग्य देव ने जो कहा हे वोह जुठ कैसे हो शकता हे इस प्रकार का परिक्षा पुर्वक का एकाग्र चिंतवन जो हे वोह धर्म ध्यान हे और इस प्रकार के विचार से जो द्रढ श्रध्धान हुआ हे वोह आग्या सम्यकत्व हे. और जो शंका कि बात करि उसमे अगर प्रश्न हे और उसका किराकरण ना करे तो शंका रहती ही हे, चली नही जाती. जब कि परिक्षा कर के निर्णय करने से तो शंका दुर होगी. इस लिये शास्त्रो मे भी कहा हे कि "प्रुच्छना स्वाध्याय का अंग हे", "आग्या प्रधानी से परिक्षा प्रधानी बढिया हे", "नय-प्रमाण से वस्तु का निर्णय करना चाहिये", और आहारक शरीरधारी मुनिराज भी शंका दुर करने के लिये उस लब्धि का उपयोग करते हे एसी बात मिलति हे.

अब कहते हे कि परिक्षा दो प्रकर कि हे. सामान्य और विशेष. सामान्य स्वरुप कि परिक्षा मे देव, गुरु शास्त्र के सामान्य लक्षणो कि प्रतिति ठीक करनी हे और विशेष में यह सामान्य स्वरुप कि समज को व्यक्तिगत देव, गुरु, शास्त्र पर अप्लाय करनी हे.

अब परिक्षा का विषय क्या हे वोह कहते हे: १> देव गुरु, धर्म/शास्त्र कि परिक्षा करनी हे. २> जिवादि सात तत्व कि परिक्षा करनी हे. ३> बन्ध और मोक्ष रुप मार्ग कि परिक्षा करनी हे.

गोम्मटसार मे भी जो बात आती हे कि "सम्यग द्रष्टि जिव गुरु के निमित्त से जुठ भी ग्रहण करे तो आग्या मानी इस लिये मिथ्यात्व का दोष नही लगता", वोह बात भी सुक्ष्म कथन कि जिस कि परिक्षा अनुमान आदि से नहि कर शकते उसकी बात हे.

अब अगली भुल बतलाते हुए कहते हे कि जब अगर जीव परिक्षा करते भी हे तो सामान्य लक्षण से परीक्षा करते हे. दया, शिल कि बाते हे इस लिए जैन धर्म सच्चा धर्म हे या फ़िर पुजा आदि कार्यो से कषाय मंद होती हे इस कारण, चमत्कार आदि के कारण, या इष्ट वस्तु कि प्राप्ति होती हे उस कारण जैन धर्म सच्चा धर्म हे एसी परिक्षा करते हे.  यहा लक्षण मे भुल हे. पहली समस्या यह हे कि अन्य जगह चमत्कार दिखे, या शिल, दया या पुजा रुप व्यवहार धर्म कि क्रिया दिखे तो, वहा से इष्ट कि प्राप्ति हो तो वोह अन्य धर्म अंगिकार कर ले. तो यहा सच्चा श्रध्धान कहा हुआ? दुसरी समस्या यह हे कि जो लक्षण होता हे वह तो अति व्याप्ति , अव्याप्ति, और असंभव, इन तिन दोष से रहित होना चाहिये. यहा सामान्य नैतिकता, सदाचार कि बात हर धर्म करता हे इस लिये अतिव्याप्ति का दोष लगता हे. इस तरह स्थुल बातो से परिक्षा नही हो शकती.

तो जिनमत के कौन से लक्षण से परीक्शा करे एस कोइ पुछे तो कहते हे कि सम्यग दर्शन, ग्यान, चारित्र मोक्षमार्ग हे यह जिनमत का सच्चा लक्षण हे. पहले जो देवादि और जिवादि रुप परिक्षा के विषय कि बात कही उन्ही विषयो को जानना और मानना यह स. ग्यान और स. दर्शन हे , और उससे रागादिक मिटने वोह हुआ स. चारित्र. यह निरुपण जिनमत में हे एसा अन्य नही मिलेगा.    

अन्य कई सारे जिव जिनमत संगति से या अन्य महान पुरुशो को देख या देखा देखी मे ग्रहण करते हे. यहा कहते हे कि उन्का जिन मत ग्रहण करके भला ही हुआ हे लिकेन अब उनको आगे बढना चाहिये और खुद विचार रुप पुरुषार्थ कर के जैन धर्म के सच्चे और मुल रहस्यो को पहचान कर जैन धर्म का मर्म समजना चाहिये. इस तरह से तत्वविचार करने से वितराग-विग्यान रुप जैन धर्म कि महिमा समज में आती हे.

Friday, December 4, 2009

व्यवहाराभासी मिथ्यादृष्टी

Class Date: 12/1/09
Chapter: 7
Page#: 213
Paragraph #:3
Recorded version: http://cid-52d749a4f28f4c05.skydrive.live.com/self.aspx/Public/MMP%20class/Chapter%207/12-01-2009%5E_Chap7%5E_Vyavharabhasi%5E31.WAV
Summary:



निश्चयाभासी में जो भी मिथ्या मान्यताये है उनका निराकरण प्रवचनसार की एक गाथा द्वारा किया जा सकता है:
"सुविदितपयत्थसुत्तो संजमतव संजुदो विगादरागो
समणो सम्सुहदुक्खो भणिदो सुद्धोवओगोत्ति "
अर्थात -
जिन्होंने पदार्थों को और सूत्रों को भली भांति जा लिया है , जो संयम और तपयुक्त है, जो वीतराग अर्थात राग द्वेष से रहित है और जिन्हें सुख दुःख सामान है, ऐसे श्रमण को शुद्धोपयोगी कहा गया है






व्यवहाराभासी मिथ्यादृष्टि :
इसमें व्यव्हाराभासी मिथ्यात्व में गृहीत मान्यताओं के साथ अग्रुहित मिथ्यात्व मान्यताओं का भी वर्णन मिलेगा
यहाँ जिन्होंने व्यवहार को तो धारण किया है परन्तु वासव मैं व्यवहार को धारण नहीं किया है उसका वर्णन किया है, इसमें भूल के सम्बन्ध में जो भूल करते हैं वो बताया है यहाँ पर किसी क्रिया का निषेध करना उद्देश्य नहीं है अपितु शुद्धोपयोग का स्थापन करना उद्देश्य है

* निश्चय व्रत : शुद्धोपयोग में परिणमन
* व्यवहार व्रत : शुभोपयोग में परिणमन
* व्यवहार धर्म : शुभोपयोग के समय व्रत रूप मन, वचन, काय की प्रवृत्ति
* जहाँ साधन - भक्ति, व्रत, ताप और साध्य - मोक्ष में अंतर है (भिन्न साधानसाध्य भाव ) उसका मुख्यता से उपदेश है, उन्ही साधन को अंगीकार करके आचरण करके उसे ही सर्वधर्म के अंग मान लेने से सम्यग्दर्शन नहीं होता बल्कि मिथ्यव्भव ही पुष्ट होता है
*यहाँ जो पूजा तथा पुजादी में जो भगवान के लिए राग होता उत्पन्न होता है उसका निषेध नहीं किया है बल्कि पुजादी करने से ही मुझे मोक्ष मिल जायेगा इस मान्यता का निषेध किया है
* यहाँ यह जानकर की इनसे मोक्ष नहीं होता जानकर पाप में प्रवृत्ति मत करने लग जाना अर्थात यहाँ इसका पाप प्रवृत्ति की अपेक्षा निषेध नहीं है बल्कि यहाँ जो जीव व्यव्हारादी प्रवृत्ति में ही संतुष्ट हो जाते है उन जीवो को मोक्षमार्ग में लगाने के लिए निरूपण किया है
* अब जो कथन करते है उसे सुनकर शुभप्रव्रत्ति को छोड़ अशुभ प्रवृत्ति में प्रवर्तन करोगे तो तुम्हारा ही बुरा होगा और यदि यथार्थ श्रद्धान कर मोक्षमार्ग में लगोगे तो तुम्हारा भला होगा
सार : यहाँ पर व्यवहराभासी की मिथ्या मान्यता की सिर्फ व्यव्हार की क्रियाओं मात्र से मोक्ष मिल जायेगा, वही धर्म है उसे सही कराकर उसे शुद्धोपयोग में स्थापित करना ही उद्देश्य है

Tuesday, November 24, 2009

MMP Class Notes - November 23rd, 2009

Class Date: ११/२३/२००९
Chapter: ७
Page#: २१०
Paragraph #: last para
Recorded version:
Summary:
** बात यह चल रहि हे कि जानना तो जिव का स्वभाव हे, उससे बन्ध केसे हो शकता हे.
बन्ध का कारण तो जानना राग-द्वेश सहित हे उस पे निर्भर करता हे.
पर या स्व को जानने से कोइ मतलब नही हे, वितरागता से निस्बत हे.

** जानना तो जिव का लक्शण हे अगर जानने से बन्ध होता तो एसा कहना पडता कि जानने का अभाव होगा तब बन्ध नहि होगा और इस लिये तब मोक्श होगा.
इस तरह चैतन्य के लक्शण का अभाव हो जायेगा, जिवपने का अभाव हो जायेगा, फिर विश्व कि व्यवश्था केसे बनि रहे?

** दुसरि बात यह हे कि ग्यान चैतन्य का लक्शण हे यह जानकर एक प्रकार कि निर्भयता आनी चाहीये कि ग्यान तुमसे कोइ छिन नहि शकता,
धन छुट जायेगा, शरीर छुट जायेगा लेकिन जानना कभी नही जायेगा. यह ग्यान कि महिमा हे.

** अब revise करते हे कि पर को जानने से अगर बन्ध हो तो क्या problem हो शकते हे?
१> केवली भगवान तो स्व-पर समस्त लोक को जान रहे हे अगर जानने से आश्रव हो तो भग्वान को कितना आश्रव होगा?
२> आगम मे कहा हे कि शुक्ल ध्यान में भि पर द्रव्य का ग्यान होता हे. तो पर को जानने का निषेध उस अवश्था मे भि नहि.
३> चोथे गुणस्थानक वाला शुध्ध उपयोगरुप आत्मा ध्यान करनेवाला श्रावक छठे गुणस्थानक वाले मुनिराज कि जो अशुभोपयोग रुप आहार कि क्रिया करते हे उनसे श्रावक को कम निर्जरा होती हे.
यहा तर्क यह हे कि मुनिराज कि तीन कषाय चोकडी ना होने से उनके अभिप्राय मे राग-द्वेश कि लेवेल श्रावक के राग-द्वेश से काफी कम हे.
इस तरह अभिप्राय मे राग-द्वेश कि परिणति बन्ध का मुख्य कारण हे.
४> अवधि ग्यान और मनःपर्याय ग्यान में जिव सिर्फ पर को जानता हे फिर भि उन्कि विशुध्दि बढि हुइ हे और निर्जरा भि ज्यादा हे.
५> एक हि विषय को अलग अलग जिव जाने या अलग-अलग समय पर एक जिव जाने तो उससे अलग अलग बन्ध होता हे.

प्रश्नः कोइ पुछे कि पर को जानने का प्रयोजन क्या हे?
तो बतलाते हे कि पर को जानना इस लिये जरुरी हे कि उससे स्व को यथार्थ जाना जा शके.
पर को भि जानने का प्रयोजन स्व को पकडने के लिये हि हे.
अगर पर को बराबर न जाने तो स्व क्या हे वोह पक्का निर्णय नहि जो शकता.
कभि पर को भि स्व मान लेने कि भुल हो शकति हे अतिक्रमन आदि कि संभावना रहती हे.
निंबु और सतंरे मे भेद ना पता हो तो कभि बडे निंबु को संतरे मानने कि भुल हो शकति हे.

दुसरि बातः जिस तरह पर को जानने का प्रयोजन भी स्व को जानना हि हे यह याद रखना जरुरी हे, उसि तरह यह भि याद रखना जरुरी हे कि सिर्फ पर को जानने मे सन्तुष्ट नही होना हे और स्व को जानने का लक्श भी नही भुलना हे.

** समयसार में सुंदर कलष हे जिस का अर्थ हेः
"भेद ज्ञान कि भव्य भावना बिना विराम के ( प्रमाद के बिना ) लगातार और सच्चे मन से ( प्रामाणिकता से ) तब तक भावते रहना जब तक पर से विरक्त होकर ग्यान स्व मे स्थित न हो.
इससे अधिक तो जिनेश्वर क्या कहे?

** यहा निश्चयाभासी कलष के माध्यम से तर्क करता हे और प्रश्न करता हे किः भेद् ग्यान हो जाने के बाद पर का जानना नही रहता और सिर्फ आप को आपरुप जानता हे. तो फिर पर को जानने कि क्या जरुरत हे?
-> जब पहेले स्व-पर को एक जानता था यानि कि पर को पररुप नहि जानता था तब भेद्ग्यान से पर को पर जाना.
अब उसके बाद, पर को पर रुप जानने लगा. अब पर को स्व रुप जो जानना था वोह मिट गया.
यानि कि पर को जानना नहि मिटा सिर्फ उसको स्व रुप जानना मिटा हे. पर को पर रुप जानना तो हमेशा रहेगा.

** अन्य बातः भेद ग्यान हो जाने के बाद सम्यक्त्व मे एक प्रकार कि सहजता आ जाती हे. यह कितनि अदभुत अनुभुति होगि.
स्व-पर कि यथार्थ समज सहजता के साथ. इस से सहज सुख प्रगट होता हे जो कि सच्चा सुख हे.
यह मंद कषाय का सुख नही , यह कषाय के अभाव का सुख हे.

** अब प्रश्न होता हे कि अगर पर द्रव्य का जानना या स्व के विशेश को जानना विकल्प नहि हे तो किस को विकल्प कहेंगे?
यहा २ मुख्य बात हे विकल्पता में ..
१> राग-द्वेश के साथ ज्ञेय को जानना , उदाहरणः खट्टा या मीठा स्वाद जानना तो सिर्फ जानना हुआ लेकिन यह मिठा स्वाद अच्छा हे यह राग हुआ. अगर खट्टे - मिठे कि पहचान हि ना कर शके तो यह तो ग्यान कि अयथार्थता हो जायेगि.
२> उपयोग का एक ज्ञेय में लगना , फिर छुटना और वहां से दूसरे ज्ञेय में भ्रमित होते रहना

अगर यह दोनो बात होगी तब विकल्प होंगे.
इसके बारे मे ज्यादा चर्चा अगली क्लास में करेंगे.

Tuesday, November 17, 2009

Notes from class of 11/17/09

Class Date: 11/17/09
Chapter: 7
Page#: 209
Paragraph #: 4
Recorded version:
Summary:

Chp 7: Pg 209

Revision:

Nischayabhas kya hai: Nischayabhas ka matlab nischay nay ko sacche rup se nahi samajhna, keval abhas hona. Koi baat jo Dravya ki apeksha se kahi gai ho usey paryay ki apeksha lagana etc. bhul isme pai jaati hai. Jo example dekeh, unme jo baate kahi hai, vo sahi hai, prantu apeksha galat hai. For eg. Disease is the same- fever; goal is the same, to be disease free; however the medicine for cold fever will be different than the one for hot fever. So is to be applied for nischay nay and vyavahar nay- Moksha marg alag alag nahi hai, parantu hamari pariniti ke anusar humein moksh marg par aage badhne ke liye alag alag davaii/ilaj bataya jaata hai.

Nischayabhas ka fal kya hai: swachandta (ashubh mein pravarti karma aur unko dharm therana) and mand udyam (pramad, aalas)

Pg 209: 4th para: Vikalp nirvikalpta kya hai:

Q: Kya Shuddhatma ka chintan hi anubhav hai? Kya shuddhatma ka chintan samvar nirjara hai aur anya dravya ka chintan aashrav bandh rup hai?

A: Yeh saccha shraddhan nahi. Kyonki kisika bhi chintan karo (sva ya par dravya ka), yadi vo raag dvesh rahit hai, to vahaa samvar nirjara hai aur yadi sva dravya ka bhi chintan ho parantu raag dvesh sahit hai, to vahaa aasrav bandh hai. Bandh to raag dvesh se hota hai, par dravya ko jaanne se bandh nahi hota. Jaankar usme isht anisht manna, yeh bandh hai. Yadi par dravya ke jaane se aasrav bandh ho to kevli to samast lok ke samast dravyo ko jaante hai- to unka bhi bandh aasrav ho.. parantu aisa nahi hota.

Q: Chadmast ke pardravya ke chintan se aasrav bandh hota hai? (Kevli ke to nahi hota- to jo Kevli nahi un sab chadmast ke hota hai kya?)

A: Aisa bhi nahi. Shukl dhyan (8th gunsthan) mein bhi chaho dravya ke dravya gun paryay ke chintan ka nirupan kiya gaya hai isliye us mein bhi pardravya ka chintan hota hai. Avdhi aur manah paryay gyan mein bhi rupi padartho ko jaanna hi hai (aatma ka nahi- arupi ka nahi). 4th gun sthan mein bhi koi swa dravya ka chintan kare aur 5th gun sthan vaale muniraj aahar adi kar rahe ho, to bhi samvar nirjara muniraj ki jyada hai kyonki unka rag dvesh kam hai, kashay kam hai (upar ke gun stahn mein pehle 3 kashay nahi hote isliye raag dvesh kam hai- anantanubandhi, pratyakhan aur apratyakhan kashay nahi hote).

For example: swarg mein koi mithyatvi hai aur narki mein koi smayaktvi hai, to kaun jyada sukhi hai? Narki ka samyaktvi, kyonki uske raag dvesh kashay kam hai. So, bahya paravrti se pata nahi chal sakta ki kiska aasrav bandh ya samvar nirjara jyada hai, vo apne antarang parinati aur raag dvesh pe nirbhar karta hai.

Bottomline: sva dravya par dravya ke chintan se samvar nirjara nahi- raag aadi ghatne se samvar nirjara hote hai. Jaanna to svabhav hai- usse kaise bandh ho?

Q: Nirvikalp anubhav dasha mein nay praman nikshep aadi ke vikalp ka nishedh hai- to vahaa jaanne ka nishedh kiya kyo hai? Praman, nay, nikshep aadi se to jaanna hota hai- to iska nishedh kyo kiya hai?

A: Jo jeev inhi vikalpo mein lage rehte hai aur abhed rup ek aatma ke bare mein nahi sochte, unke liye aisa kaha gaya hai. To be cont'd in the class of 11/18/09.

-Shweta

Wednesday, November 4, 2009

MMP class notes - Novemember 3rd, 2009

Class Date: 11/03/2009
Chapter: 7
Page#: 205
Paragraph #: 3rd
Recorded version:
Summary:
निस्चयाभसि के बाह्य प्रव्रुत्ति के पिछे क्या मान्याता होति हे उस्कि बात चल रहि हे.
पांचवा पॉइंट हे की वोह शुभोपयोग रूप क्रिया को हेय जानता हे.

revision:
पिछलि क्लास मे हमने थोडे प्रश्न देखे थे शुभ और अशुभ के बारे मे, उसका review कर लेते हे.

१> शुभ भाव भले हे या बुरे - अच्छे हे या बुरे ?
शुभ भाव कर्म के बन्ध के कारण हे इस लिये वे बुरे हि हे और आश्रव के हि भेद हे,
पुण्य - पाप दोनो एक मात के हि दो पुत्र हे.
भले दुनिया एसा ना देखे लेकिन पुण्य के उदय को भला जानना तो मिथ्या श्रध्धान होगा.

२> शुभ भाव करने चाहिये कि नहि ( बुरे हे तो भि )?
यहा अपेक्शा से कथन करेंगे.
अशुभ भाव कि अपेक्शा शुभ भाव करने चाहिये और सुध्ध भाव कि अपेक्शा शुभ भाव नहि करने चाहिये.

दुसरि बातः सुध्धोपयोग से पहेले सुभ भाव सहज हि होते हे , करने हे एसा सोचना नहि पडता.
जिस जीव को शुद्धोपयोग का सच्चा लक्ष्य बन गया है, उसके लिए तो ऐसा ही है. लेकिन जिसका ऐसा नहीं हुआ हो और ऐसे भाव सहज रूप से न होते हो, तो बुद्धि-पूर्वक करने योग्य है, उसमे उपयोग लगाना योग्य है.

और एक बात: सिधा अशुभ भाव से सुध्ध भाव मे जाना नहि हो सकता।
अशुभ से शुद्ध में नहीं जाया जाता. शुभ रूप परिणामो से हो कर ही शुद्धोपयोग होता है. इसके लिए करण परिणामो (करण लब्धि) को जानना.

३> शुभोपयोग रुप शुभ क्रिया धर्म हे कि नहि हे?
निश्चय से धर्म नहि हे और व्यवहार से धर्म हे.
निश्चय से तो राग-द्वेश रहित समता भाव के परिणाम को धर्म कहेते हे.
शुभोपयोग कुछ राग से मिश्रित हे इस लिये निश्चय से वोह धर्म नहि हे.

दुसरि बातः मंदिर आये, पुजा कि तो धर्म हो गया एसा मानकर संतुष्ट नहि होना हे.
अंतरंग मे जांच करनि हे कि सुध्धोपयोग का लक्श बन्धा हे कि नहि.

page 205: 3rd para:
** यद्यपि शुभ अशुभ दोनो बन्ध के कारण हे फिर भि शुभ से कषाय मन्द होति हे और अशुभ से कषाय तिव्र होति हे तो शुभ को छोड अशुभ मे जानेरुप घाटे का सोदा क्यो करे?

** यहा शुभ और अशुभ को दो अपेक्शा से समान कहाः १> अशुध्धता कि अपेक्शा और २> बन्ध के कारण कि अपेक्शा.

** यह समान वालि बात तो उन जिवो के लिये कि हे जो शुध्ध को लक्श मे लाते हि नहि और सिर्फ शुभ को हि मोक्श का साधन जानते हे, और जो शुभ को सर्वथा उपादेय जानते हे.

** जब शुभ और अशुभ का परस्पर विचार करे तो शुभ से कम नुक्शान हे और अशुभ से ज्यादा नुक्शान हे इस लिये सुध्धोपयोग न हो तब अशुभ से हटकर शुभ मे प्रवर्तना हि योग्य हे.

** अगर हम सिर्फ शुभ-अशुभ को हेय जान लो और उसका विशेश न समजो तो हमारा हि नुक्शान होगा, मोक्श मार्ग का एकदम सच्चा श्रध्धान करना हे.

** प्रश्नः अशुभ तो हुये बिना रहेता नहि हे और शुभ प्रव्रुत्ति तो इच्छा कर के करनि पडती हे , इच्छा तो विकल्प रुप हे तो एसे विकल्प क्यो करे?
->
यहा पहली बात तो यह हे कि अशुभ प्रव्रुत्ति भि बिना इच्छा के नहि होति हे. इच्छा तो तब भि होति हि हे लेकिन वह इच्छा बहुत हि सहज हो गइ हे. अनादि के सन्सकार और मोह का control होने से हम को वोह इच्छा देखेने कि आदत नहि हे.
इस लिये जेसे शुभ को विकल्प रुप जाना उसि तरह अशुभ भि विकल्प रुप हि हे.

-> दुसरि बातः शुभ प्रव्रुत्ति मे उपयोग लगाने से और उसका अभ्यास करते रहने से अशुभ कि प्रव्रुत्ति कम होने लगेगि और अशुभ से हट्कर शुभ मे जान सहज होने लगेगा.
इस तरह शुभ कि इच्छा करना और कम पापरुप क्रिया करना लेकिन शुभ का त्याग कर सदा निःशंक पापरुप प्रवर्तना योग्य नहि.

-> तिसरी बातः किसि आदमी कि एसि इच्छा हो कि बिल्कुल धन नही खर्चना हे और वोह देखे कि बहुत धन खर्च हो रहा हे तो वोह अपनी इच्छा से कम धन खर्च हो एसा उपाय करेगा. विकल्प और इच्छा आदि कषाय से होते हे, ग्यानी तो बिलकुल भी कषाय करना नहि चाहता लेकिन जब ज्यादा कषायरुप अशुभ कार्य होते देखे तो अपनी इच्छा से अल्प कषाय के शुभ कार्य मे उध्यम करेगा।

शारांश मे एसा कह शकते हे की जिव को हमेशा शुध्धोपयोग का लक्ष्य रखकर, जब शुध्धोपयोग का कार्य बन रहा हो तब शुभोपयोग और अशुभपयोग इन दोनों को समान जान उन को गौण करते हुए अपने शुध्धोपयोग के परिणाम बनाए रखने का पुरुषार्थ करना चाहिए, और जब अशुभपयोग का कार्य बन रहा हो तब शुभोपयोग को कम कषाय रूप जानते हुए शुभोपयोग को अंगीकार कराने का प्रयत्न करना उचित होगा। जब शुभोपयोग रूप कार्य बन रहा हो तब भी उसको निश्चय से धर्म न मानते हुए और उसे कर्म बंध का कारण जान हेय मानना ही योग्य हे।