Wednesday, August 27, 2008

अधिकार ८ :: चरणानुयोग के व्याख्यान का विधान (page 282 para 4 to page 284 para 1)

प्र० केवलज्ञान के जानने की अपेक्षा तो असत्यवचनयोग १२वें गुणस्थान तक कहा है, तो क्या ऐसा है कि १२वें गुणस्थान वर्ती मुनिराज असत्य बोलते हैं?
उ० वचनयोग ४ प्रकार का कहा है:- सत्यवचनयोग, असत्यवचनयोग, उभयवचनयोग और अनुभयवचनयोग। असत्य बोलने के २ कारण हो सकते हैं (१) अज्ञान से, (२) कषाय से (राग, द्वेष आदि)। १२वें गुणस्थान तक अज्ञान रूप अवस्था कही है। उस अपेक्षा से उपचार से ऐसा कहा है कि असत्य वचनयोग १२वें गुणस्थान तक है।

प्र० अचौर्य महाव्रत में बिना दी हुई चीज को ग्रहण करने में भी चोरी का दोष है, अदत्तकर्मपरमाणु आदि परद्रव्य का ग्रहण १३वें गुणस्थान तक कहा है?
उ० केवली भगवान १३वें गुणस्थान तक कर्म परमाणु और नोकर्म परमाणु ग्रहण करते हैं, उस अपेक्षा से यह भी उपचार से कहा है।

प्र० अन्तरंग परिग्रह १०वें गुणस्थान पर्यन्त कैसे कहा?
उ० अन्तरंग परिग्रह १४ प्रकार का (मिथ्यात्व, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसक वेद) इनमें से सूक्ष्म लोभ १०वें गुणस्थान(सूक्ष्मसाम्पराय) तक रहता है।

प्र० बाह्य परिग्रह समवसरणादि केवली के भी होता है?
उ० समवसरण आदि होता केवली के ही है परन्तु केवली द्वारा बनाया नही होता और ना ही भगवान उसमें अपनापन रखते हैं। वो सब तो देवोकृत अतिशय होते हैं। परन्तु उपचार से केवली के ही कहने में आता है क्योंकि उनके चारों ओर होता है।

--> प्रमाद अर्थात कुशलकार्यों में असावधानी (स्वरूप में असावधानी)। मुनिराज अपने महाव्रतों को पालने में असावधानी(प्रमाद) नहीं करते। उनका अंतरंग अभिप्राय तो केवल अपने स्वरूप में लीन होने का ही है। परन्तु करणानुयोग में सुक्ष्मता से कथन किया जाता है जो कि केवलज्ञान गम्य है इसलिये उक्त सर्व ही बातें उसी तरह से उपचार से कहीं हैं।

--> मुनि के पंचेन्द्रिय विषयों का त्याग कहा है तो मुनि के पन्चेन्द्रिय विषयों की इच्छा का स्थूलरूप से तो अभाव हुआ है परन्तु इन्द्रिया तो अपना काम करती ही हैं, और अगर उनको विषयों में सम्पूर्ण राग द्वेष दूर हो जाये तो यथाख्यात चारित्र मानें जो तो हुआ नहीं है।

--> श्रावक के भी त्याग व आचरण चरणानुयोग की पद्धति अनुसार व लोक प्रवृत्ति अनुसार ही होता है जैसे अगर त्रस हिंसा का त्याग किया है तो चरणानुयोग के अनुसार या लोक प्रवृत्ति के अनुसार ही करेगा करणानुयोग के अनुसार नहीं क्यों कि वह तो केवली गम्य है हम उन त्रस जीवों को देख भी नहीं सकते।

--> अविरति अर्थात त्याग का अभाव, अविरति १२ प्रकार की है:- ५ इंद्रियां + मन + त्रस हिंसा + ५ स्थावर हिंसा। चरणानुयोग की अपेक्षा छठे गुणस्थान में इन १२ प्रकार की अविरतियों का अभाव होता है अर्थात त्याग के अभाव(अविरति) का अभाव होता है। उसमें मन अविरति का भी अभाव कहा,
मुनि को मन के विकल्प होते हैं परन्तु मन की पापरूप प्रवृत्ति का अभाव होता है इसलिये अभाव कहा। करणानुयोग की अपेक्षा छठे गुणस्थान में ३ कषाय चौकडी(अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरणी, प्रत्याख्यानावरणी) का अभाव होता है।


दान के पात्र:-

दान देना चरणानुयोग में कहा है इसलिये चरणानुयोग की अपेक्षा ही पात्र व अपात्र का निर्णय करना चाहिये। जो जिनदेवादि का श्रद्धानी पाया जाय वही सम्यक्त्वी अर्थात पात्र और जो श्रद्धानी नहीं हो वही मिथ्यात्वी अर्थात अपात्र।

करणानुयोग की अपेक्षा सम्यक्त्वी ४ से ऊपर के गुणस्थानवर्ती और प्रथम गुणस्थानवर्ती मिथ्यात्वी है । तो अगर कोई मुनिराज ११वें गुणस्थान से १ अंतर्मुहूर्त में ही प्रथम गुणस्थान में आ जाये तो पता ही चल नहीं सकता ये तो केवलज्ञानी को ही ज्ञात हो सकता है कि अभी कौन से गुणस्थान में है। तो पात्र अपात्र का सही निर्णय नही हो पायेगा।

द्र्व्यानुयोग की अपेक्षा सम्यक्त्व मिथ्यात्व ग्रहण करने में भी ठीक निर्णय नहीं हो सकता क्यों कि संघ में तो भावलिंगी भी हैं और द्रव्यलिंगीं भी। पहले तो उनको कैसे पहचानेंगे कि कौन से सम्यक्त्वी हैं और कौन से मिथ्यात्वी और अगर किसी सम्यक्त्वी ने पहचान भी लिया तो और द्रव्यलिंगी को नमस्कार न करे या दान ना दे तो संघ में सबको पता चल जायेगा कि वे मिथ्यादृष्टि हैं इससे उन मुनि को कैसा लगे और संघ में विरोध हो जाये।
इसलिये चरणानुयोग की अपेक्षा ही दान के पात्र का सही निर्णय करना चाहिये।

प्र० सम्यक्त्वी को द्रव्यलिंगी मुनि की भक्ति करनी चाहिये ना नहीं?
उ० हां, क्योंकि द्रव्यलिंगी व्यवहार धर्म से सम्यक्त्वी से बडा/प्रधान है और भक्ति करना भी व्यवहार ही है। जैसे दो भाई हैं छोटा भाई अधिक धनवान है और बडा गरीब है तो छोटा भाई बडे का सम्मान करेगा ही क्योंकि पद में वो अभी भी बडा है उसी प्रकार सम्यक्त्वी को भी द्रव्यलिंगी की भक्ति करनी चाहिये।

Thursday, August 21, 2008

व्य्व्हार-निश्चय का उपदेश - २७९ पेज से २८० तक

२ प्रकार के उपदेश - २७९ पेज से २८० तक


२ प्रकार के उपदेश - २७९ पेज से २८० तक

अरिहन्त भगवान ने जीवो का उपकार करने के लिये २ प्रकार के उपदेश दिये है
१-व्यवहार क्रिया - व्यवहार क्रिया का उपदेश पाप क्रिया को त्याग कर पुन्य क्रिया को करने को कहा और फिर क्रिया के अनुसार जब परिणाम तीव्र कषाय से मन्द कषाय रूप हो जाते है तब अणुव्रत ओर महाव्रत पालन करने का उपदेश दिया. एकदेश ओर सर्वदेश पाप क्रिया कम होती है ओर परिणाम शुभ व शान्त और राग भी मन्द होते जाते है. एकदेश - सर्वदेश वीतरागता होने पर, श्रावक दशा - मुनिदशा अंगीकार करते है.
कषाय भाव जितने कम हो उतना ही अच्छा - जिस प्रकार जिसने रात्रि भोजन का ही त्याग नही किया उसे रात्रि मे पानी का त्याग उचित नही है पह्लले रात्रि भोजन का ही त्याग हो फिर रात्रि मे पानी का त्याग उचित है.
इस प्रकार का बाह्य क्रिया का उपदेश परम्परा वीतराग्ता का पोषण करता है
व्यवहार सम्यक दर्शन का अर्थ - दया को धर्म मानना, जिनमत पर श्रद्धा, तत्वज्ञान की श्रद्धा, शन्का दोष से मुक्ति होना, शास्त्रो का अभ्यास, व्रतो के पालन का उपदेश देते है
२-निश्चय क्रिया- र्निश्चय सहित व्यवहार मे परिणमो की प्रधानता होती है तत्व ज्ञान के जानने/अभ्यास के कारन परिणाम शुध हो जाते है शन्का आदि से विमुखता होती है ओर फिर बाह्य क्रिया अपने आप सुधर जाती है. परिणाम सुधर् जाना पर बाह्य क्रिया पर अपने आप ध्यान जाता है ओर सुधार हो जाता है
ज्ञान के ३ दोष:
1. सन्शय - तत्व में शन्का (है या नही) रस्सी है या साप है, आत्मा है या नही, कर्म, भेद विज्ञान सत्य है या नही
2. विपर्यय - विपरीत तत्व ज्ञान होना, श्रद्धा तो हो पर ज्ञान सहि ही ना हो
3. अनध्यवसाय - क्या है क्या नही कुछ पता नही. आत्मा,७ तत्त्व, जीव , अजीव जानने से किया फ़ायदा है, अपने को किया करना?
निश्चय सम्यक दर्शन का अर्थ - ७ तत्वो का सच्चा श्रद्धान होना निश्चय सम्यक दर्शन है जब सच्चे देव पर श्रद्धान हो जाता है तब क्रिया अपने आप ही होती जाती है व्यवहार क्रिया को उपचार कहा है मन्द राग का अभाव होने पर शुध उपयोग बनता जाता है
जैसी वक्ता की स्थीती होती है वैसा ही उपदेश दिया है जो सिर्फ़ व्यवहार ही करता है उसे तत्व अभ्यास का उपदेश दिया ओर जो सिर्फ़ तत्व अभ्यास ही करता है उसे व्रत पालन ओर नियम पालन का उपदेश दिया जोकी अंतत: मोक्ष मार्ग मे ही ले कर जाता है

Tuesday, August 19, 2008

Chapter-8 (page-279 para-3 to page-280 para-1) Date: 08/18

Nischay sahit vyavahar updesh (Parnimo ki pradhanta)

Darshan

  • Tatvo ke yatarth swarup ka shradhan karate hain
    Yatarth = Bhutarth = Vastavik = Real
    Example:
    1. Jivadi ka vastavik swarup like jiva gyan mai hai, jiva upyog mai hai, shakti mai hai etc (jive ke svabhav) ka updesh dete hain.
    2. Pudgal - karma ka swarup, karm bandhan kaise hot hai, asravadi kaise hain, svayam ke ragaadi parinam kaise hote hain etc. Ragadik parnim ko dukh dayak batakar unse viprit atama ke parniamo ko sukh dayak bataya hai and that explains sanvar and neerjara tatva.

  • Nischay swarup vastavik swarup hai(as listed in examples above) aur vyavahar swarup(like jiva indriyo vala hai, manusiya aadi gati/pariyayo main rehen vala) upchar hai aise shradhan se and with sva-par (sva=jiva, par=ajiv) ke bhed gyan dwara per dravya main ragadi chodne ke prayojan sahit (per dravya main rag karna = asrav bandh and ragaadi chodne = sanvar neerjara) un 6 tatvo ka shradhn karne ka updesh dete hain. Aaise 7(6 listed above + moksh) tatvo ke shradhn se Arihant aadi (jin dev/guru/shastra/dharma) ke alava baki subh jhoothain lagainge aur unko manana chut jata hain.
    Upchar - jo vastavik hai nahin use us kisi apexa us rup kehena (because of nimit-nametik relation ex: Jiva to murtik kehena owing to its association wtih body and karmas)

  • Nischay samyak darshan: Per dravya se bhin sva dravya/atama ka shradhan karna.
  • Vyavahar samyak darshan: True dev/shastra/guru ka shradhan hona without any "shanka".
  • Vyavahar updesh: Vyavahar updesh main kahenge ke ku guru, ku dev and ku shastra chode or su guru, su dev and su shastra ka shradhan karo
  • Nischay sahit vayvahar updesh: In Nischay shait vayvahar updesh sache tatvo ka shardhan karne ka updesh hai because of which jhuthain dev/guru/shastra ka shardhan apne aap chut jayega.


Gyan

  • Sansay aadi (sansay + vipariya + Andhyavasay) rahit above mentioned tatvao ka abhyas.
    Nischay updesh: Sansay aadi rahit gyan ki aradhana (tatvo ko janne ka updesh).
    Vyavahar updesh: Tatvo ko jane ke karn Shastra ka abhyas.
  • Sansay : Tatvo main shanka/doubt.
    Example: Raagadi mere hain ya nahin hain, atama mera hi swarup hai ya aniya dravya ka swarup hai, sarir se atama bhin hai ya nahin, death ke baad atama ka astitva hota hai ya nahin..etc
  • Vipariya : Ulta/galat gyan.
    Example: Pakka maan lena ke atama aur sarir ek hi hai, swarg/narka aadi nahin hotain etc.
  • Andhyavasay: There is no doubt but jaananeki kyo bhavana nahin hai.
    Example: jiva hai to hai nahin he to nahin hai etc

  • Vyavahar samyak gyan: Jinvani ka abhyas karna.



Charitra

  • Ragaadi dur karne ka updesh dete hain. Ekdesh, sarvadesh aadi tivra rag chutne se unke related papkriya chutti hai aur mand-rag se vrato ki pravruti hoti hain. Mand-rag ke bhi chutne se shudh upyog ki pravrati hogi.
  • vyavahar updesh aur nischay updesh main nimit-nematik/sadhan-sadhiya relation hai. Vrat ityadi sadhan hai aur ragaadi dur karna sadhiya hai.
    Note: Vrat ityadi karne se ragaadi chute ya na bhi chute but ragaadi chutne se mand-rag se vrat ityadi ki pravruti (dev/shastra/guru ka shradhan, jinvain ka abhyas etc) hoti hi hai.
  • Samyak dristiyo aur samyak gyaniyo ke niyamo ka bhi nirupan karte hain.
    Example: Bhakti kaise karni, Shastro ko kaise padhana etc.

  • Vyavahar samyak Charitra: Vrat ityadik palne ka updesh.


In Charanaanuyoga, tivra kasay chod kar mand kasay rup karya karne ka updesh hota hai. Although both tivra & mand kasays are harmful, yet if it is not possible to give up all the kasyas at once charanaanuyog advocates for mand kasay which is less intensed and beneficial compared to tivra kasays. Mand kasay se parampara kasay(continious sequence of sinful acitivities) ka poshan nahin hota aur parinam nirmal hote hain.

Examples: (sequence of activities one should follow)

  • Jin jivo ko ghar aadi banvane ka parigrah (asubh parinam) ho unhe "mandir" banvane ka (subh parinam) updesh dete hain.
  • Jin jivo ka thoda bahut paap karya chutta hai unhe samyaktva dharne karne ka aur anuvrat aadi palne ka updesh dete hain
  • Jin jivo ke anshik ragaadi chutte hain unhe dharma karya karne ka updesh dete hain.
  • Jin jivo ke complete arambhaadik paap karya chut jai unhe pujaadik aur mahavrataadi ka updesh dete hain.
    (anuvrat - Anshik (ekdesh) tayag, mahavrat - 5 paapoka complete tayag)
  • Jin jiva ke sare rag dur ho jaye unke liye kuch (kriya) karne ka updesh nahin hain since there is nothing left to do.

Thursday, August 14, 2008

Notes from class of 8/13/08: Chapter 8 pg 278:

Notes from class of 8/13/08: Chapter 8 pg 278:

Tatha papike to paap vasna:

Here Panditji describes how shriguru tries to do upkaar for every jeev. Since all jeevs are not at the same level, they all cannot be prescribed the same type of upkaar. Some might be at a level where they can be taught about nischay whereas some might be at a level where only vyavahar might be understood.

Vyavahar updesh mostly consists of bahya kriya (jo saadhan hai, sadhya nahi). By engaging in these bahya kriyas, at least for that time, we are inclined to stop doing paap kriya and get involved in punya kriya. Consequently, our kashay also changes from tivra to mand.

Here it is further clarified that our parinam needs to be improved- kriya will improve consequently as a result of improvement in the parinam.

Additional notes:

Nischay se sharir ki kriya important nahi par uska updesh phir bhi dete hai kyonki usse nimit naimittik / sadhan sadhya smabandh hai.

Aloo ka example: Today it might be possible to grow potatoes above ground level and therefore can be called non jamikand. So can we eat such potatoes? The answer is no because here we have to think about our parinam. The idea of all niyams, tyag etc. is to reduce our raag and if after leaving something we still get tempted, then our parinam has not changed. Parinam change ho jaaye aisi kriya kyon kare?

Another point of revision was samyak darshan as per all the 4 anuyogs.

Parinam: Vyaktta sse khayal mein aata hai
Abhipray: This is one’s core belief.

With parinam, our abhipray should also change.

Homework: Read Neminath bhagwan's charitra

Thursday, August 7, 2008

8/06/08 Page 274 Last para,

तथा कितने ही पुरुषों ने....
* प्रथमानुयोग में लौकिक कार्यों कि सिद्धि के लिये पूजनादिक करना बताया जाता है, तथा उन कार्यों की प्रशंसा करते है, परन्तु वास्तव में ऐसा करने से-
१ - निःकांक्षित गुण( अर्थात धर्म के बदले में लौकिक इच्छा का अभाव) का अभाव होता है।
२- निदानबन्ध नामक आर्त्तध्यान होता है।
निदानबन्ध आर्त्तध्यान - भोगों, अच्छी वस्तुओं की सामान्य इच्छा निदानबन्ध आर्त्तध्यान है, यह ५ वें गुणस्थान वालें को भी हो सकती है ।
निदान शल्य- धर्म कार्य के बदले में अच्छी वस्तुओं कि प्राप्ति कि वांछा होना । यह मिथ्यात्व है।
जहां निदान शल्य है वहां निदानबन्ध आर्त्तध्यान तो होगा हि होगा।
३- पूजनादि करने के पीछे उद्देश्य तो पाप पूर्ति का ही है अतः पाप का बन्ध होता है।

सो जीव कुदेवादिक के पूजन में नहीं लगा उसके बदले में सुगुरु सुदेवादिक के सेवन में लगा, उससे पुत्रादिक कि प्राप्ति बताइ है तो उसका गुण ग्रहण करना, किन्तु उसे भली प्रकार जानना, तथा उससे जीव के राग कि भी मन्दता होती है।

* प्रथमानुयोग से सिद्धांत नहीं निकाले जाते, करणानुयोग, द्रव्यानुयोग व चरणानुयोग से सिद्धांत निकाले जाते हैं\

करणानुयोग के व्याख्यान का विधान:

- करणानुयोग में जैसा केवलज्ञान में जाना वैसा ही वर्णन है।
- केवलज्ञान में तो सूक्ष्म से सूक्ष्म ज्ञान भी जानने में आता है किन्तु करणानुयोग में जीव के प्रयोजनभूत बातों जैसे कर्म, त्रिलोकादि का ही वर्णन होता है।
- उसमें भी हम छद्मस्थ ( अपूर्ण ज्ञान रुप अवस्था , स्थ = स्थित रहने वाला) के ज्ञान में सारी बातें विस्तार से नहीं आ सकती तो उनको संकुचित करके बताते हैं।